लखनऊ. उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है. जिसके माध्यम से उन्होंने प्रदेश के ऊर्जा विभाग की ओर पीएम का ध्यान आकर्षित किया. अजय राय ने पत्र में लिखा कि ‘उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी संलग्न समाचारों के माध्यम से उत्तर प्रदेश में श्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में संचालित शासन-व्यवस्था के कुछ अत्यंत चिंताजनक पहलुओं की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहती है. इन समाचारों का अवलोकन करने पर यह प्रतीत होता है कि पहले से ही भयंकर बेरोजगारी और महंगाई का दंश झेल रही प्रदेश की जनता विद्युत व्यवस्था से जुड़े विषयों पर, प्रशासनिक मतभेद, संस्थागत टकराव, नियामक संस्थाओं को निष्प्रभावी किए जाने तथा अतिरिक्त आर्थिक बोझ का सामना करने के लिए भी विवश है.

समाचारों का निम्नलिखित बिन्दुवार अध्ययन यह संकेत देता है कि समस्या केवल बिजली आपूर्ति या तकनीकी व्यवधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि शासनतंत्र के विभिन्न अंगों के मध्य समन्वय के अभाव, उत्तरदायित्व की अस्पष्टता और जनहित से जुड़े निर्णयों के क्रियान्वयन में गंभीर कमियों का भी प्रश्न है:

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ऊर्जा मंत्री बनाम पावर कॉर्पोरेशन सरकार के भीतर असाधारण टकराव

12 जून 2026 को प्रकाशित समाचारों में स्वयं उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री द्वारा पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए गए। ऊर्जा मंत्री ने भर्ती, छंटनी, प्रशासनिक निर्णयों और फ्यूलसरचार्ज जैसे विषयों पर सार्वजनिक आपत्ति व्यक्त की. यदि विभाग का राजनीतिक प्रमुख स्वयं यह कहने की स्थिति में पहुंच गया है कि उसकी जानकारी के बिना निर्णय लिए जा रहे हैं, तो यह सामान्य प्रशासनिक मतभेद नहीं बल्कि शासन व्यवस्था की गंभीर विफलता का संकेत है.

क्या ऊर्जा मंत्री को मुख्यमंत्री का विश्वास प्राप्त है?

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की भूमिका से जुड़ा है. यदि ऊर्जा मंत्री की शिकायतें सही हैं, तो मुख्यमंत्री द्वारा उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई? क्या ऊर्जा मंत्री को मुख्यमंत्री का विश्वास प्राप्त है? यदि ऊर्जा मंत्री के आरोप सही हैं, तो मुख्यमंत्री द्वारा अब तक क्या कार्रवाई की गई? और यदि वे निराधार है, तो उन्हें पद पर बनाए रखने का औचित्य क्या है? दोनों ही स्थितियों में यह प्रश्न अनिवार्य रूप से मुख्यमंत्री की जवाबदेही से जुड़ता है.

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आरक्षण व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों पर प्रश्न

ऊर्जा मंत्री द्वारा स्वयं यह आरोप लगाया गया है कि पावर कॉर्पोरेशन में भर्ती एवं छंटनी के मामलों में जाति एवं पंध के आधार पर भेदभावपूर्ण निर्णय लिए जा रहे हैं. यदि यह आरोप सही है, तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर सीधा आघात है. इस विषय की स्वतंत्र जांच अत्यंत आवश्यक है.

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग की उपेक्षा फ्यूलसरचार्ज पर आयोग के निर्देशों की अवहेलना

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग का दायित्व उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना और वितरण कंपनियों को जवाबदेह बनाना है. प्रदेश की जनता बिजली संकट, स्मार्ट मीटर विवाद, ट्रांसफॉर्मर विफलता और वितरण अव्यवस्था से जूझ रही थी किन्तु उपलब्ध घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि आयोग के निर्देशों और उपभोक्ता हितों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया. 10 प्रतिशत फ्यूलसरचार्ज लागू किए जाने के बाद आयोग द्वारा स्पष्टीकरण मांगा जाना यह प्रश्न उठाता है कि क्या वितरण कंपनियों नियामकीय व्यवस्था को केवल औपचारिकता मानकर चल रही हैं.

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एक ओर पावर कॉर्पोरेशन द्वारा मई माह में 99.24 प्रतिशत शिकायतों के निस्तारण का दावा किया गया, वहीं दूसरी ओर पूरे माह प्रकाशित समाचारों में उपभोक्ता प्रदर्शन, सड़क जाम, उपकेंद्रों का घेराव, कर्मचारियों को बंधक बनाए जाने और लंबे समय तक बिजली बाधित रहने की घटनाएं सामने आती रहीं. यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि शिकायत निस्तारण के सरकारी आंकड़े और जनता का वास्तविक अनुभव एक-दूसरे से इतने भिन्न क्यों हैं. विगत दो महीने में प्रकाशित समाचारों से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था गहरे संकट में है. राजधानी लखनऊ, जहां निर्वाध बिजली आपूर्ति के दावे किए जाते हैं. वहीं लंबे समय तक बिजली बाधित रहने, लाखों उपभोक्ताओं के प्रभावित होने तथा व्यापक जनाक्रोश की घटनाएं सामने आईं. यदि राजधानी का यह हाल है तो प्रदेश के अन्य जनपदों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

अतः उपरोक्त तथ्यों के आलोक में केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि उत्तर प्रदेश की विद्युत व्यवस्था, 10 प्रतिशत फ्यूलसरचार्ज की वसूली, ऊर्जा मंत्री द्वारा लगाए गए आरोपों, पावर कॉर्पोरेशन की कार्यप्रणाती, उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के निर्देशों की अवहेलना और आरक्षण एवं भर्ती-छंटनी संबंधी नियमों के कथित उल्लंघनों की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराई जाए. इस जांच से मुख्यमंत्री, ऊर्जा मंत्री एवं पावर कॉर्पोरेशन के मध्य वास्तविक उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सकेगा. उत्तर प्रदेश की जनता के हितों के संरक्षण के लिए आपके तत्काल हस्तक्षेप की प्रतीक्षा रहेगी.’