प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी नियुक्तियों से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति जिस प्रमाणपत्र के आधार पर हुई है, वह निर्णायक रूप से फर्जी साबित हो जाता है तो ऐसी नियुक्ति शुरू से ही शून्य मानी जाएगी. ऐसी नियुक्ति को समाप्त करना दंडात्मक बर्खास्तगी नहीं माना जाएगा.
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा कि इस स्थिति में संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस देकर जवाब का अवसर देना और प्राकृतिक न्याय के व्यापक सिद्धांतों का पालन करना पर्याप्त है.
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फर्जी प्रमाणपत्र साबित होना जरूरी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत तभी लागू होगा, जब नियुक्ति के लिए इस्तेमाल किए गए प्रमाणपत्र का फर्जी होना निर्णायक रूप से स्थापित हो जाए. महज संदेह या रिकॉर्ड में कमी के आधार पर नियुक्ति को फर्जी नहीं माना जा सकता. कोर्ट की यह टिप्पणी शिक्षक नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आई.
TET-2013 प्रमाणपत्र की जांच से खुला मामला
मामला वर्ष 2013 की शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के आधार पर उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक नियुक्त किए गए अभ्यर्थियों से जुड़ा था. 20 जुलाई 2018 के शासनादेश के तहत वर्ष 2010 के बाद हुई नियुक्तियों की जांच के निर्देश दिए गए थे. जांच के दौरान याचिकाकर्ताओं के TET-2013 प्रमाणपत्रों पर दर्ज अनुक्रमांक ऑनलाइन रिकॉर्ड से मिलाए गए, लेकिन उनका रिकॉर्ड नहीं मिला.
वेतन रोका, नोटिस के बाद सेवा समाप्त
रिकॉर्ड नहीं मिलने के बाद 25 अक्टूबर 2020 को संबंधित शिक्षकों का वेतन रोक दिया गया. इसके बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया. प्रक्रिया पूरी होने के बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, इटावा ने 13 जून 2022 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं. इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कीं
हाईकोर्ट ने कहा कि जब नियुक्ति का आधार ही फर्जी प्रमाणपत्र हो और यह तथ्य निर्णायक रूप से साबित हो जाए, तो ऐसी नियुक्ति को जारी रखने का आधार नहीं बचता. कोर्ट ने बीएसए के आदेश को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दीं. फैसले से सरकारी भर्ती में प्रमाणपत्रों की सत्यता और दस्तावेजों के सत्यापन की अहमियत भी स्पष्ट होती है.
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर हुई सरकारी नियुक्ति शुरू से शून्य मानी जाएगी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी नियुक्ति रद्द करना दंडात्मक बर्खास्तगी नहीं है.



