डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के प्रति अविश्वास और नाटो (NATO) से हटने की धमकियों के बाद, यूरोपीय देश अब अपनी रक्षा के लिए आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। ट्रम्प की तरफ से हाल के दिनों उठाए गए कदमों की वजह से यूरोप अमेरिका पर सुरक्षा निर्भरता कम करना चाहता है। ट्रम्प कई बार अमेरिका को नाटो से अलग करने की बात कह चुके हैं। मध्य पूर्व की जंग और बढ़ते वैश्विक तनाव के बीच अब यूरोप एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी में है. यूरोपीय देश एक ऐसा नया सुरक्षा ढांचा तैयार कर रहे हैं, जिसे अनौपचारिक तौर पर “यूरोपियन NATO” कहा जा रहा है. खास बात यह है कि इस योजना में अमेरिका को जानबूझकर अलग रखा जा रहा है.
होर्मुज स्ट्रेट संकट के बीच यूरोप अब अमेरिका से अलग होकर अपनी सुरक्षा रणनीति बना रहा है. ब्रिटेन-फ्रांस के नेतृत्व में “यूरोपियन NATO” जैसा नया ढांचा तैयार किया जा रहा है. इससे होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग रूट को फिर से बहाल करने की कोशिश की जाएगी.
यह पूरी रणनीति मुख्य रूप से होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित बनाने पर केंद्रित है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है. यूरोप का मानना है कि युद्ध खत्म होने के बाद इस रूट को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी होगा. इसी को ध्यान में रखते हुए ब्रिटेन और फ्रांस इस पहल की अगुवाई कर रहे हैं.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस हफ्ते 40 से ज्यादा देशों की एक बड़ी बैठक बुलाने जा रहे हैं, जिसमें इस नई सुरक्षा योजना पर चर्चा होगी.
इस प्रस्ताव के तहत एक बहुराष्ट्रीय रक्षा गठबंधन बनाया जाएगा, जो समुद्री जहाजों की सुरक्षा, माइन हटाने और निगरानी का काम करेगा. खास बात यह है कि यह पूरी व्यवस्था यूरोपीय कमांड के तहत चलेगी, न कि अमेरिका के नेतृत्व में. यही से बदलाव की इस योजना की शुरुआत होती है.
दरअसल, यह कदम सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है. हाल के दिनों में कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका के सैन्य अभियान या ब्लॉकेड जैसी रणनीतियों का समर्थन करने से इनकार कर दिया है.
इस योजना के तीन मुख्य लक्ष्य बताए जा रहे हैं. पहला, युद्ध के दौरान फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना. दूसरा, समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाना और तीसरा, भविष्य में जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए निगरानी और एस्कॉर्ट सिस्टम तैयार करना.
हालांकि, इस योजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या ईरान इस तरह के किसी मिशन को मंजूरी देगा. इसके अलावा, यूरोप को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस मिशन के दौरान किसी तरह का नया टकराव न हो क्योंकि सामने अमेरिका होगा, जिसने होर्मुज स्ट्रेट के आसपास ब्लॉकेड लगा रखा है.
जर्मनी जैसे देश, जो पहले अलग सैन्य रास्ते के खिलाफ थे, अब इस पहल का समर्थन कर रहे हैं. अगर जर्मनी इसमें शामिल होता है, तो इसकी माइन-क्लीयरिंग क्षमता इस मिशन को और मजबूत बना सकती है. यही वजह है कि अब यूरोप “आत्मनिर्भर सुरक्षा” की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
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