हेमंत शर्मा, इंदौर। इंदौर नगर निगम में आखिर इतना ताकतवर कौन है कि भोपाल से निकले आदेश भी यहां आकर दम तोड़ देते हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि नगरीय प्रशासन विभाग की ओर से जारी प्रतिनियुक्ति आदेश पर एक बार फिर इंदौर के इंजीनियरों ने हाईकोर्ट से राहत हासिल कर ली है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह वही विभाग है जिसके मंत्री कैलाश विजयवर्गीय हैं और जिन्होंने भागीरथपुरा दूषित पानी कांड के बाद जवाबदेही तय करने और व्यवस्था सुधारने की बात कही थी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही दिखाई दे रही है। जिन इंजीनियरों को दूसरे नगर निगमों में भेजने के आदेश जारी हुए थे, वे आज भी अपनी कुर्सियों पर बने हुए हैं और सरकार का आदेश अदालत में अटक गया है।
क्या है पूरा मामला ?
नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने 15 जून 2026 को इंदौर नगर निगम के कुछ इंजीनियरों को प्रतिनियुक्ति पर अन्य नगर निगमों में भेजने के आदेश जारी किए थे। इन्हीं आदेशों के खिलाफ नगर निगम इंदौर के कर्मचारी शैलेंद्र मिश्रा हाईकोर्ट पहुंच गए। याचिका में तर्क दिया गया कि वे इंदौर नगर निगम के कर्मचारी हैं और उन्हें किसी दूसरे नगर निगम या नगरपालिका में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला भी दिया। अदालत ने प्रथम दृष्टया तर्कों को सुनने के बाद नोटिस जारी करते हुए ट्रांसफर आदेश के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। साथ ही याचिकाकर्ता को वर्तमान पदस्थापना स्थल पर कार्य जारी रखने की अनुमति भी दे दी।
भागीरथपुरा कांड के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
यह वही इंदौर नगर निगम है जहां कुछ समय पहले भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी की सप्लाई का मामला सामने आया था। इस घटना में कई लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग बीमार पड़े थे। पूरे प्रदेश में इस मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी थी।उस समय जिम्मेदार अधिकारियों और इंजीनियरों की भूमिका पर सवाल उठे थे। सरकार ने भी सख्ती के संकेत दिए थे और माना जा रहा था कि लापरवाही के लिए जवाबदेही तय होगी। लेकिन अब जो तस्वीर सामने आ रही है, वह बिल्कुल उलट है। जिन अधिकारियों और इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद थी, वे न सिर्फ सिस्टम में बने हुए हैं बल्कि सरकार के ट्रांसफर आदेशों को भी अदालत में चुनौती देकर राहत हासिल कर रहे हैं।
एक साल पहले भी हुआ था यही खेल
यह पहला मौका नहीं है जब इंदौर नगर निगम के इंजीनियरों ने सरकार के आदेशों को अदालत में चुनौती दी हो। करीब एक साल पहले भी लगभग 10 इंजीनियरों के तबादले किए गए थे। तब भी मामला कोर्ट पहुंचा था और संबंधित अधिकारियों को राहत मिल गई थी।अब एक बार फिर वही स्थिति बन गई है। भोपाल से आदेश जारी हुए, लेकिन इंजीनियरों को समय पर रिलीव नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें हाईकोर्ट जाने का पूरा समय मिल गया और अब आदेश पर रोक लग गई।
सबसे बड़ा सवाल- रिलीव क्यों नहीं किया गया?
- पूरा विवाद अब एक सवाल पर आकर टिक गया है।
- यदि सरकार और विभाग वास्तव में इंजीनियरों को दूसरी जगह भेजना चाहते थे तो उन्हें आदेश जारी होते ही रिलीव क्यों नहीं किया गया?
- क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही थी?
- क्या नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों ने जानबूझकर देरी की?
- या फिर इंदौर नगर निगम में इंजीनियरों का ऐसा प्रभाव है कि उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई अंतिम परिणाम तक नहीं पहुंच पाती?
- इन सवालों के जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं हैं।
मंत्री के आदेश बनाम निगम की हकीकत
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि जिस विभाग की कमान कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ नेता के हाथ में है, उसी विभाग के आदेश बार-बार अदालत में क्यों अटक रहे हैं? अगर सरकार कार्रवाई करना चाहती थी तो उसकी तैयारी इतनी कमजोर क्यों थी? और यदि कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए थी तो फिर जवाबदेही तय करने के दावे क्यों किए गए?
फिलहाल इंजीनियरों की जीत
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल इंजीनियरों को राहत मिल गई है और वे अपने वर्तमान पद पर काम करते रहेंगे। अंतिम फैसला बाद में होगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि भोपाल से निकले आदेश इंदौर पहुंचकर फिर कमजोर पड़ गए हैं।
कुल मिलाकर सवाल यही है
भागीरथपुरा कांड के बाद सरकार सख्ती दिखाना चाहती थी या सिर्फ संदेश देना चाहती थी? क्योंकि जमीन पर तस्वीर यह है कि एक साल में दूसरी बार इंदौर के इंजीनियर सरकार के आदेशों पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।
इस मामले में सबसे हैरान करने वाला तथ्य यह सामने आया कि इंजीनियरों की ओर से याचिका दायर किए जाने की आशंका को देखते हुए कैविएट भी दायर की गई थी, ताकि कोर्ट में नगर निगम का पक्ष मजबूती से रखा जा सके। लेकिन सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से कोई वकील ही खड़ा नहीं हुआ। यानी एक तरफ सरकार ने ट्रांसफर आदेश जारी किए, दूसरी तरफ निगम प्रशासन इंजीनियरों को समय पर रिलीव नहीं कर पाया और जब मामला अदालत पहुंचा तो निगम का पक्ष रखने वाला वकील भी मौजूद नहीं रहा।



