पटना। बिहार कांग्रेस के भीतर चल रही संगठनात्मक कलह और असंतोष अब राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर पहुंच गया है। ‘बिहार कांग्रेस बचाओ अभियान’ के बैनर तले राज्यभर से आए कई पूर्व विधायक, पूर्व जिला अध्यक्ष, प्रदेश स्तर के पूर्व पदाधिकारी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय, इंदिरा भवन के सामने धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। नाराज नेताओं का मुख्य उद्देश्य पार्टी की वर्तमान कार्यशैली और नेतृत्व के खिलाफ अपनी आवाज राष्ट्रीय उच्चाकमान तक पहुंचाना है।
चार प्रमुख मांगें और राहुल गांधी से मुलाकात की गुहार
नाराज कांग्रेसी नेताओं ने राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने चार सूत्रीय मांगें रखी हैं। उनका पहला और सबसे प्रमुख आग्रह राहुल गांधी से मुलाकात का समय पाने का है, ताकि वे उन्हें बिहार कांग्रेस की जमीनी हकीकत और सांगठनिक समस्याओं से सीधे अवगत करा सकें। इसके साथ ही, हाल ही में जिन समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं या पार्टी से निष्कासित किया गया है, उन सभी दंडात्मक पत्रों को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की गई है।
तनाव का मुख्य केंद्र बिहार कांग्रेस के वर्तमान प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम हैं, जिन्हें तुरंत उनके पदों से हटाने की पुरजोर मांग उठाई जा रही है। नेताओं का यह भी आरोप है कि संगठन में पदों के वितरण और नए लोगों को पार्टी में शामिल करने की पूरी प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं बरती गई हैं। उन्होंने मांग की है कि इसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में पदों के बंटवारे में सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का पूरा ध्यान रखा जाए।
दस महीने का लंबा इंतजार और नेतृत्व पर अनदेखी का आरोप
विद्रोही गुट के प्रमुख चेहरों में शामिल एआईसीसी सदस्य आनंद माधव ने बताया कि 3 नवंबर 2025 को उनकी मुलाकात पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से हुई थी। उस महत्वपूर्ण बैठक में वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत और नासिर हुसैन भी मौजूद थे। उस दौरान उन्होंने बिहार कांग्रेस में चल रही अनियमितताओं का कच्चा-चिट्ठा सामने रखा था, जिस पर राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उन्हें आश्वासन दिया था कि बिहार चुनाव संपन्न होने के बाद एक विस्तृत बैठक बुलाई जाएगी और सभी मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
आनंद माधव ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि उस मुलाकात को अब 10 महीने बीत चुके हैं। उन्होंने और उनके साथियों ने कई बार लिखित प्रतिवेदन भी सौंपे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई और न ही समय मिल पाया। इसी मजबूरी और अनदेखी के चलते उन्हें 8 सितंबर को कांग्रेस मुख्यालय के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।
सादाकत आश्रम की स्थिति और सांगठनिक पतन पर चिंता
नाराज नेताओं ने स्पष्ट किया है कि उनका यह विरोध किसी भी रूप में कांग्रेस पार्टी की विचारधारा या संगठन के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह बिहार में पार्टी का संचालन कर रहे वर्तमान नेतृत्व की कार्यप्रणाली के विरुद्ध है। वे खुद को पार्टी का वफादार सिपाही मानते हैं जो केवल संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इसके साथ ही, पटना स्थित ऐतिहासिक कांग्रेस मुख्यालय ‘सादाकत आश्रम’ को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। कांग्रेसी जिसे अपना राजनीतिक मंदिर मानते हैं, वहां अब दूसरे दलों से आए लोगों और कथित अराजक तत्वों की दखलअंदाजी और गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। नेताओं ने आरोप लगाया कि ‘संगठन सृजन’ के नाम पर विरोधी दलों के व्यक्तियों को केवल पद का लालच देकर कांग्रेस में धकेला जा रहा है, जिससे मूल और समर्पित कार्यकर्ताओं खुद को बुरी तरह उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने इस पूरी भर्ती प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और इसकी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।



