रवि रायकवार, दतिया। Chaitra Navratri 2026: मध्य प्रदेश के दतिया स्थित खैरी माता मंदिर एक प्राचीन और सिद्धपीठ है, जो दिन में तीन बार अपने स्वरूप बदलने के लिए प्रसिद्ध है। 1658 में दतिया के महाराजा वीरसिंह जूदेव द्वारा निर्मित यह मंदिर पहाड़ी पर खैर के पेड़ों के बीच स्थित है। दतिया से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर यह मंदिर है।
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1658 में महाराजा वीरसिंह जूदेव ने करवाया था मंदिर का निर्माण
वेसे तो दतिया धार्मिक नगरी है और माई की नगरी के नाम से जाना जाता है। यहां एक और प्रसिद्ध स्थान है। जिसे खैरी वाली माता के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण दतिया के महाराजा वीरसिंह जू देव ने सन 1658 में करवाया था। यहां खैर के वृक्षों का समूह मंदिर को चारों ओर से घेरे है। पहले इसे खेरागढ़ के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन जब से मंदिर की स्थापना हुई तब से इस जगह को खेरी के नाम से जाना जाने लगा।
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राजा के स्वप्न में आई थीं मां
इस जंगल के बीच एक विशाल पहाड़ी को खैरागढ़ के नाम से जाना जाता था। इसलिए इस देवी का नाम खैरी वाली माता के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि दतिया नरेश को माता ने स्वयं को सेंवढ़ा स्थित सनकुआं में होने का स्वप्न दिया था। जब राजा सनकुआं पहुंचे तो माई का विग्रह प्राप्त हुआ। राजा विग्रह को हाथी घोड़ों के माध्यम से दतिया लाए और अपने महल में विराजने की कोशिश की, तो माई ने उन्हें दोबारा खैरागढ़ में स्थापित करने का स्वप्न दिया।

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दिन में 3 बार स्वरूप बदलती हैं मां
तब राजा ने उन्हें खैरी मंदिर पर स्थापित किया। यह देवी दिन में तीन स्वरूप बदलने के लिए भी प्रसिद्ध है। मां का सुबह का चेहरा बाल अवस्था का, दोपहर का युवावस्था का और शाम का वृद्धावस्था के रूप में दिखाई देता है। लगभग 50 से अधिक सीढ़ी चढ़ने के बाद मां के दरबार में पहुंचा जा सकता है।
नवरात्रि में होते हैं विशिष्ठ पूजा अनुष्ठान
वैसे तो मंदिर में पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है। लेकिन नवरात्रि में मां के दरबार में भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। सुबह 4 बजे से ही यहां भक्तों के आने का सिलसिला शुरु हो जाता है। सप्तमी पर रात 2 बजे से ही पट खुल जाते हैं। बताया जाता है कि सप्तमी पर माता खेरी के विशेष दर्शन होते हैं।

