शुभम जायसवाल, राजगढ़। मध्य प्रदेश के राजगढ़ शहर से 5 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित मां जालपा मंदिर एक ऐसा पवित्र धाम है, जहां आस्था, चमत्कार और प्राचीन परंपराएं आज भी जीवित हैं। यहां विराजित मां जालपा की मूर्ति “भू-मूर्ति” मानी जाती है। अर्थात यह मूर्ति किसी मनुष्य की ओर स्थापित नहीं की गई, बल्कि मां स्वयं इस स्थान पर प्रकट हुई हैं। इसी कारण यह मंदिर अत्यंत जागृत और चमत्कारी शक्ति स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।
मां जालपा मंदिर का इतिहास भी अत्यंत गौरवशाली और प्राचीन माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र पर कभी भील राजाओं का शासन था और उन्हीं के समय से यहां मां जालपा की पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई। भील शासकों की गहरी आस्था मां के प्रति थी और उन्होंने इस स्थान को एक पवित्र साधना स्थल के रूप में विकसित किया। समय के साथ यह स्थान जन-जन की श्रद्धा का केंद्र बन गया। यहां की सबसे विशेष और अनोखी परंपराओं में से एक है।
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“स्वास्तिक” की मान्यता
जो भक्त अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में आते हैं, वे मंदिर में “उल्टा स्वास्तिक” बनाकर अपनी मन्नत व्यक्त करते हैं। यह एक प्रतीक होता है कि उनकी इच्छा अभी अधूरी है। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है, तो वे पुनः मंदिर आकर उसी स्वास्तिक को “सीधा” कर देते हैं। यह परंपरा मां के प्रति विश्वास और कृतज्ञता का अनूठा रूप है। मां जालपा मंदिर विशेष रूप से उन परिवारों के लिए आस्था का केंद्र है, जिनके बच्चों की शादी में बाधाएं आ रही होती हैं। जिन युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा होता, उनके माता-पिता यहां आकर मन्नत मांगते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां जालपा की कृपा से बिना मुहूर्त (शुभ समय) के भी विवाह संपन्न हो जाते हैं और जीवन में खुशियों का आगमन होता है।
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यहां “पाती” की परंपरा भी अत्यंत प्रसिद्ध है
भक्त अपनी मनोकामना को एक पाती (प्रार्थना पत्र) में लिखकर मां के चरणों में अर्पित करते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है और विवाह संपन्न हो जाता है, तो वे पुनः उसी पाती को मां के चरणों में चढ़ाकर धन्यवाद और आभार व्यक्त करते हैं। मां जालपा मंदिर की ये सभी परंपराएं इसे केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवंत आस्था और चमत्कारों का केंद्र बनाती हैं। यहां आने वाला हर श्रद्धालु मां की दिव्य शक्ति को महसूस करता है और अपने जीवन में नई उम्मीद और सकारात्मक ऊर्जा के साथ लौटता है।

