हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर… करोड़ों नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की विकास योजनाओं का केंद्र। लेकिन इन दिनों शहर में सड़कों, सीवर और पानी से ज्यादा एक शब्द चर्चा में है- “कमीशन”। नगर निगम के गलियारों से लेकर ठेकेदारों की बैठकों तक, राजनीतिक चर्चाओं से लेकर आम लोगों की बातचीत तक एक ही सवाल बार-बार सुनाई दे रहा है- क्या विकास कार्य पूरी पारदर्शिता से हो रहे हैं या फिर विकास की आड़ में कोई ऐसा सिस्टम खड़ा हो चुका है, जिसके बिना कोई बड़ा काम आगे नहीं बढ़ता?
हजारों करोड़ से ज्यादा के प्रोजेक्ट लेकिन सवाल भी उतने ही बड़े
इंदौर में इस समय सीवर लाइन, वाटर मैनेजमेंट, नर्मदा जल आपूर्ति, पाइपलाइन विस्तार और सोलर ऊर्जा जैसी कई बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है।
- सीवर एवं वाटर मैनेजमेंट – लगभग 306.80 करोड़ रुपये
- नर्मदा जल आपूर्ति एवं पाइपलाइन – लगभग 907.74 करोड़ रुपये
- सोलर प्रोजेक्ट – लगभग 227 करोड़ रुपये
यानी कुल मिलाकर 1400 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं। यही वह रकम है, जिसके इर्द-गिर्द अब राजनीतिक आरोप और सवाल दोनों घूम रहे हैं। इधर खुद की पार्टी के ही लोग “फूफा का खेला” बता रहा है, जबकि आधिकारिक तौर पर इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है।
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‘सिस्टम’ की चर्चा आखिर क्यों?
शहर में चर्चा है कि बड़े ठेके मिलने के बाद कुछ प्रभावशाली लोगों के जरिए कथित तौर पर संपर्क साधे जाते हैं। विपक्ष और कुछ राजनीतिक हलकों का दावा है कि फाइलों की गति, भुगतान और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर एक समानांतर “सिस्टम” काम करता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन सवाल यह है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हो रहा है, तो फिर ऐसी चर्चाएं बार-बार क्यों उठ रही हैं? यही वजह है कि विपक्ष इस पूरे मामले को “फूफा के कमीशन का खेल” बताकर सरकार और नगर निगम पर निशाना साध रहा है।
चार साल में संपत्तियों को लेकर भी सवाल
राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा लगातार सुनाई देती है कि पिछले कुछ वर्षों में कुछ लोगों की कथित आर्थिक हैसियत और संपत्तियों में आई तेजी। बेनामी निवेश, महंगी जमीनों के सौदे, व्यावसायिक हिस्सेदारी और आलीशान संपत्तियों को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं।
क्या ‘ना’ कहने वालों पर बढ़ता है दबाव?
कुछ ठेकेदारों और राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि जो लोग कथित व्यवस्था का हिस्सा बनने से इनकार करते हैं, उन्हें विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। आरोप लगाए जाते हैं कि अचानक निरीक्षण, तकनीकी आपत्तियां, नोटिस और काम में देरी जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।
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जनता का पैसा, जनता के सवाल
जनता टैक्स इसलिए देती है कि शहर में बेहतर सड़कें बनें, पानी पहुंचे, सीवर व्यवस्था सुधरे और विकास दिखाई दे। लेकिन जब उन्हीं परियोजनाओं पर कमीशनखोरी की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं, तब सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं रहता, बल्कि जनता के भरोसे का भी बन जाता है। विपक्ष का आरोप है कि यह पूरा मामला “फूफा का खेला” बन चुका है, जबकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
इस पूरे खेल में फूफा कौन?
इंदौर के एक बड़े नेता ने नाम फूफा रख दिया। उनका कहना है कि यार छोटी-मोटी बात पर नाराज हो जाते हैं घूमते रहते हैं कई कार्यक्रम कर लेते हैं ना उन कार्यक्रम में आता है और ना हमें बुलाते हैं। इसीलिए शादी में जिस तरीके से तूफान नाराज होते हैं, इस तरह से यह फूफा भी हमेशा नाराज नजर आते हैं। इसीलिए इन महाशय का नाम फूफा रखा गया है।
अब जवाब किसे देना चाहिए?
यदि लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह निराधार हैं तो संबंधित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को सामने आकर स्पष्ट जवाब देना चाहिए, ताकि अफवाहों और चर्चाओं पर विराम लग सके। यदि इन आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो फिर यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि जनता के पैसे और प्रशासनिक जवाबदेही का मामला है। इंदौर की जनता अब सिर्फ विकास के दावे नहीं, बल्कि विकास की पूरी पारदर्शिता भी देखना चाहती है। सवाल उठ चुके हैं, अब जवाब का इंतजार है।
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