ODISHA DESK, भुवनेश्वर: ओडिशा में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को बढ़ावा देने की सरकारी नीति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य में जारी ईंधन संकट के बीच जहां एक तरफ सरकार लोगों से ग्रीन मोबिलिटी (हरित गतिशीलता) अपनाने की अपील कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले इंसेंटिव और ब्याज मुक्त लोन को वापस लेने की खबरों ने सरकार के रुख पर ‘दोहरे मानदंड’ (डबल स्टैंडर्ड) के आरोप लगा दिए हैं। इस फैसले ने नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों के बीच भारी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब ईंधन की कमी और पेट्रोल पर निर्भरता को कम करने के लिए खुद सरकार EV को एकमात्र समाधान बता रही है।
ओडिशा सरकार लगातार नागरिकों से ईंधन की खपत कम करने और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन अपनाने के लिए इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने का आग्रह करती रही है। कई सरकारी विभागों ने भी अपने आधिकारिक कामकाज में EV के इस्तेमाल को बढ़ाने पर सहमति जताई थी और कई मंत्रियों ने भी इस बदलाव का समर्थन किया था। लेकिन, वित्त विभाग द्वारा 28 अप्रैल को जारी एक पत्र ने इस पूरे अभियान पर विवाद खड़ा कर दिया है। खबरों के मुताबिक, वित्त विभाग ने विभिन्न विभागों के सचिवों को निर्देश दिया है कि सरकारी कर्मचारियों को इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के लिए पहले से दी जा रही सब्सिडी और ब्याज मुक्त लोन की सुविधा को बंद कर दिया जाए।
इस फैसले के बाद सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या राज्य सरकार सच में EV को बढ़ावा देना चाहती है या फिर बिना किसी ठोस मदद के पूरी जिम्मेदारी उपभोक्ताओं पर डाल रही है। सब्सिडी में कटौती के अलावा, ओडिशा में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) की कमी भी एक बड़ा मुद्दा बन गई है। लोगों का कहना है कि पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन न होने की स्थिति में EV खरीदना नई मुसीबत को बुलावा देने जैसा है।
ईंधन स्टेशनों पर कतार में खड़े एक यात्री ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा: “आज हम पेट्रोल के लिए कतारों में खड़े हैं। कल क्या हमें चार्जिंग स्टेशनों के लिए भी इसी तरह लाइनों में लगना पड़ेगा?”
यद्यपि भुवनेश्वर और अन्य शहरी इलाकों में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बढ़ती मांग की तुलना में चार्जिंग स्टेशनों की संख्या अभी भी बेहद सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि चार्जिंग नेटवर्क की कमी के कारण लोग EV खरीदने का भरोसा नहीं जुटा पा रहे हैं।
देशभर से इलेक्ट्रिक वाहनों में अचानक आग लगने (बैटरी ब्लास्ट) की आ रही खबरों ने भी ग्राहकों के मन में डर पैदा कर दिया है। इसके चलते लोग पेट्रोल-डीजल गाड़ियों को छोड़कर EV पर स्विच करने से कतरा रहे हैं। इसके अलावा, कई EV मालिकों ने शिकायत की है कि वाहन खरीदने के बाद कंपनियों का आफ्टर-सेल्स सपोर्ट (सर्विसिंग) बेहद खराब है। छोटे शहरों और कस्बों में गिने-चुने सर्विस सेंटर होने के कारण गाड़ियों के रखरखाव में काफी दिक्कतें आ रही हैं। उद्योग समीक्षकों का कहना है कि ओडिशा में बड़े पैमाने पर EV क्रांति लाने से पहले इन तकनीकी और बुनियादी समस्याओं को दूर करना बेहद जरूरी है।
हालांकि, कुछ मंत्रियों का कहना है कि आम जनता के लिए EV इंसेंटिव साल 2028 तक जारी रह सकते हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारियों के फायदे रोके जाने को लेकर अब तक सरकार की तरफ से कोई स्पष्टीकरण (Clarification) नहीं आया है। इस अनिश्चितता ने राज्य की EV रणनीति पर बहस को और तेज कर दिया है। लोगों का मानना है कि जब तक मजबूत इंसेंटिव, बेहतर चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षित बैटरी और भरोसेमंद सर्विस सपोर्ट नहीं मिलेगा, तब तक ईंधन की बढ़ती कीमतों के बावजूद लोग पूरी तरह से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए तैयार नहीं होंगे।
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