“Digital content silently programs your subconscious mind.”
सावधान, मोबाइल की हर रील आपकी सोच को चुपके से बदल रही है। आज जब समय भाग रहा है, दिमाग हर पल कुछ ना सोच रहा है और जागती आंख हर समय मोबाइल के स्क्रीन में टिकी हुई है ऐसे में मोबाइल की हर रील, हर वीडियो और हर पोस्ट हमारे आपके अवचेतन मन पर अपना असर छोड़ रही है। इंसानी दिमाग एक बगीचे की तरह है उसमें जिस तरह के विचारों को बोएंगे वही पल्लवित और पुष्पित होगा।

नवजवानों के समझने के लिए सरल भाषा में कहें तो हमारा मस्तिष्क भी मोबाइल में एल्गोरिदम की तरह ही काम करता है। हम जैसा सोचते हैं वैसा ढलते हैं, जैसा सुनते हैं वैसा कहते हैं और जैसा देखते हैं वैसा ही बनते हैं। ऐसी व्यवस्था में यदि नकारात्मक, तुलना करने वाली या क्रोध पैदा करने वाले कंटेंट बार-बार देखे जाएं तो हमारा मन भी उसके अनुरूप हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि हम स्वयं को बेवजह चिड़चिड़े, बेचैन और असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। मोबाइल के दिलचस्प कंटेंट हमें व्यस्त तो रख सकते हैं लेकिन शांत और खुश नहीं रहने देते। इसके उलट अच्छी किताबें, प्रेरक कहानियां, शांति देने वाला संगीत और सकारात्मक बातें हमारे स्वभाव को धीरे-धीरे शांत और मजबूत बनाता है।

सोने से पहले और सुबह उठते ही अच्छी बातें पढ़ें या सुनें। भ्रमित, क्रोधित और भयभीत करने वाले फालतू की रील्स देखना बंद ही करें। उन चीजों को अपना कीमती समय दें, जो हमें बेहतर इंसान बनाता हों। अब जब भी मोबाइल की चमकीली रौशनी हमें लुभाने लगे, तो ठहर कर खुद से एक सवाल करें कि “जो मैं देखने जा रहा हूं, क्या वह मुझे बेहतर बना रहा है?”

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक, न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम