राकेश चतुर्वेदी, भोपाल/दतिया। मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब सिर्फ चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है। पार्टी द्वारा पूर्व गृह मंत्री और दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद दतिया का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्म हो गया है।
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समर्थकों का गुस्सा सड़कों पर फूटा
टिकट घोषित होते ही नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया, राष्ट्रीय राजमार्ग पर घंटों जाम लगाया और पार्टी नेतृत्व के फैसले के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। स्थिति बिगड़ती देख पुलिस और प्रशासन को मोर्चा संभालना पड़ा। प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए हल्का बल प्रयोग किया गया और पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया। इस पूरे घटनाक्रम ने साफ संकेत दे दिया कि दतिया में बीजेपी के भीतर असंतोष गहरा चुका है।
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चुनावी विश्लेषण
दतिया विधानसभा सीट पर नरोत्तम मिश्रा केवल एक नेता नहीं, बल्कि वर्षों से बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा रहे हैं। उनका व्यक्तिगत जनाधार, संगठन पर पकड़ और कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। हालांकि बीजेपी की लहर के बीच वो 2023 का चुनाव हार गए थे। ऐसे में टिकट बदलने का फैसला पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम होगा, या फायदे का सौदा। चुनाव परिणाम के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा। चर्चा यह भी जोरों पर है कि अब आगे नरोत्तम मिश्रा का भविष्य क्या होगा।
अभी दतिया में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही नाराजगी को शांत करना है। अब नरोत्तम मिश्रा खुलकर नए प्रत्याशी के समर्थन में उतरते हैं और कार्यकर्ताओं को एकजुट कर देते हैं, तो बीजेपी नुकसान की भरपाई कर सकती है, लेकिन यदि समर्थकों की नाराजगी बनी रहती है, बगावत जारी रहती है या वोटों का ध्रुवीकरण होता है, तो इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिलना लाजिमी है।
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दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व ने आशुतोष तिवारी पर भरोसा जताकर यह संकेत दिया है कि पार्टी नेतृत्व दतिया में बदलाव चाहता है, लेकिन चुनाव में सिर्फ टिकट बदलना काफी नहीं होता, जमीनी कार्यकर्ताओं का उत्साह और संगठन की एकजुटता भी उतनी ही अहम होती है। हालांकि आशुतोष तिवारी वो चेहरा हैं, जो 2008 से कई सीटों पर बीजेपी को जिताने वाले रणनीतिकार रहे हैं, खासकर आदिवासी बाहुल्य इलाकों में।
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फिलहाल दतिया की लड़ाई अब सिर्फ बीजेपी बनाम विपक्ष नहीं रह गई है, बल्कि यह बीजेपी के लिए अपनी अंदरूनी एकता और संगठनात्मक ताकत साबित करने की भी परीक्षा बन गई है। आने वाले दिनों में नरोत्तम मिश्रा का रुख, दिल्ली में होने वाली संभावित मुलाकात और कार्यकर्ताओं की नाराजगी किस दिशा में जाती है, इसी पर दतिया उपचुनाव का पूरा समीकरण काफी हद तक निर्भर करेगा।
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