दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा कि सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने से पहले किताबें दे दी जाएंगी। यह निर्णय एक एनजीओ द्वारा दायर की गई याचिका की सुनवाई के दौरान लिया गया, जिसमें सरकार से किताबों की आपूर्ति में हो रही देरी के संबंध में सचिव (शिक्षा) के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई थी। दिल्ली सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि गर्मी की छुट्टियों से पहले किताबें सभी छात्रों तक पहुंचा दी जाएंगी, ताकि आगामी शैक्षिक सत्र के लिए छात्र समय से तैयार हो सकें। इस कदम का उद्देश्य छात्रों को अपनी छुट्टियों के दौरान पाठ्यक्रम सामग्री का अध्ययन करने का पर्याप्त समय देना है, जिससे उनकी पढ़ाई में किसी तरह का व्यवधान न हो।
दिल्ली सरकार के खिलाफ एनजीओ सोशल ज्यूरिस्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि सरकार ने 2024 के कोर्ट आदेश की जानबूझकर अवहेलना की है। यह आदेश शैक्षिक सामग्री की समय पर आपूर्ति से संबंधित था, जिसे सरकार ने पूरा नहीं किया। एनजीओ की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सचिन दत्ता ने गंभीरता से मामला लिया और दिल्ली सरकार के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने की संभावना पर विचार किया। कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को नोटिस जारी किया और दिल्ली सरकार के पेश किए गए आश्वासन को रिकॉर्ड में लिया, जिसमें कहा गया था कि सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने से पहले किताबें वितरित कर दी जाएंगी।
सोशल ज्यूरिस्ट के वकील ने तर्क किया कि दिल्ली सरकार ने कोर्ट के आदेश की लगातार अवहेलना की है, जिसके कारण छात्रों को शैक्षिक सामग्री समय पर नहीं मिल पाई। इस देरी के चलते बच्चों की पढ़ाई में बाधा उत्पन्न हो रही है। दिल्ली सरकार ने हालांकि कोर्ट में यह आश्वासन दिया कि गर्मी की छुट्टियों से पहले किताबें छात्रों को दे दी जाएंगी, ताकि उनका अध्ययन प्रभावित न हो। यह कदम सरकार द्वारा शिक्षा के अधिकार को सही तरीके से लागू करने की दिशा में लिया गया एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
1 अप्रैल को शुरू हो चुका नया एकेडमिक सेशन
एनजीओ सोशल ज्यूरिस्ट द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान, वकील अशोक अग्रवाल ने अदालत को बताया कि दिल्ली में लाखों बच्चों के पास अब तक पाठ्य पुस्तकें नहीं हैं। उनका कहना था कि दिल्ली सरकार शैक्षिक सामग्री मुहैया कराने में विफल रही है, जिसके कारण बच्चों को मिलने वाला ‘शिक्षा के अधिकार’ का उल्लंघन हो रहा है। यह गंभीर आरोप 1 अप्रैल को शुरू हुए मौजूदा शैक्षिक सत्र से पहले किताबें वितरण में हो रही देरी को लेकर लगाया गया है।वकील अशोक अग्रवाल ने अदालत में यह भी कहा कि सरकार द्वारा बच्चों को समय पर किताबें न देने से उनकी शिक्षा प्रभावित हो रही है, और यह बच्चों के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है। इस मामले में अदालत ने दिल्ली सरकार से स्पष्टता की मांग की और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया।
वहीं, दिल्ली सरकार के वकील ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि टेंडर पहले ही जारी किए जा चुके हैं और अब तक करीब 10 लाख बच्चों को किताबें वितरित की जा चुकी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बाकी बचे हुए लगभग 8 लाख बच्चों को अगले कुछ दिनों में किताबें प्रदान कर दी जाएंगी, और सरकार इस प्रक्रिया को जल्द पूरा करने के लिए काम कर रही है।
कोर्ट ने मांगी स्टेट्स रिपोर्ट
दिल्ली सरकार से स्टेटस रिपोर्ट तलब की है। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने अगली तारीख सितंबर में तय की है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार मौजूदा शैक्षणिक सत्र के लिए किताबों के वितरण हेतु टेंडर प्रक्रिया पूरी कर चुकी है और पहले भी किताबों का वितरण किया जा चुका है। सरकार की ओर से यह भी आश्वासन दिया गया कि गर्मियों की छुट्टियों से पहले कक्षा 1 से 8 तक के शेष सभी छात्रों को किताबें उपलब्ध करा दी जाएंगी।
2024 के आदेश का दिया हवाल
वहीं, याचिकाकर्ता एनजीओ ने अपनी याचिका में बताया कि हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने 4 जुलाई 2024 को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सरकारी स्कूलों के सभी बच्चों को तय समयसीमा के भीतर किताबें, नोटबुक, लेखन सामग्री और फर्नीचर उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इसके तहत संबंधित प्राधिकरण इस व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं। एनजीओ ने यह भी उल्लेख किया कि शिक्षा सचिव द्वारा जारी औपचारिक सूचना में कहा गया था कि पूरी टेंडर और सप्लाई प्रक्रिया निर्धारित समयसीमा के अनुसार पूरी की जानी चाहिए, ताकि छात्रों को मार्च के अंतिम सप्ताह तक या नए शैक्षणिक सत्र (1 अप्रैल) शुरू होने से पहले हर हाल में किताबें मिल सकें।
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