दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) में गुरुवार को एक असामान्य मामला सामने आया, जहां एक व्यक्ति ने तलाक की याचिका के साथ अपनी पत्नी की निजी तस्वीरें भी अदालत में दाखिल कर दीं। इस पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे अनुचित बताया। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह की निजी तस्वीरों को न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाना उचित नहीं है और पक्षकारों को संवेदनशील व्यक्तिगत सामग्री दाखिल करते समय पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर चूक करार दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह का कृत्य स्वीकार्य नहीं है और संवेदनशील निजी दस्तावेजों को सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने के बजाय सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि संबंधित पक्ष की निजता और गरिमा की रक्षा की जा सके।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के कृत्य को किसी भी तरह से उचित या स्वीकार्य नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही यह भी माना कि वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में इस प्रकार की गलतियां कई बार देखने को मिलती हैं, जिन्हें समय रहते सुधारा जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के संवेदनशील दस्तावेजों को खुले रिकॉर्ड में दाखिल करने के बजाय सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि संबंधित पक्ष की निजता और गरिमा सुरक्षित रहे।

 तलाक याचिका के साथ पत्नी की निजी तस्वीरें दाखिल किए जाने के मामले में कहा कि संवेदनशील और निजी प्रकृति के दस्तावेजों को अदालत में पेश करने से पहले न्यायालय की अनुमति ली जानी चाहिए और उन्हें सीलबंद लिफाफे में ही दाखिल किया जाना चाहिए।अदालत ने कहा कि वर्ष 2015 के अपने एक फैसले में भी यही निर्देश दिए गए थे। उस फैसले के अनुसार, निजी या संवेदनशील दस्तावेजों को खुले रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने के बजाय अदालत की अनुमति लेकर सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि संबंधित व्यक्ति की निजता और गरिमा की रक्षा हो सके।  याचिकाकर्ता महिला ने दलील दी कि प्रतिवादी पति और उसके वकील ने फैमिली कोर्ट में दायर तलाक याचिका के साथ बिना किसी बदलाव के उनकी निजी तस्वीरें संलग्न कर वर्ष 2015 के निर्देशों का उल्लंघन किया है।

पत्नी की निजी तस्वीरें दाखिल करने के मामले में कहा कि यह एक गंभीर चूक है, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए पति और उसके वकीलों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करना उचित नहीं होगा। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने कहा कि जब प्रतिवादी पति और उसके वकीलों से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया, तो उन्होंने अपने कृत्य को सही ठहराने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय उन्होंने अदालत से बिना शर्त माफी मांगी।

महिला की निजता पर हाई कोर्ट सख्त

पीठ ने मामले में स्पष्ट किया कि महिलाओं से जुड़े मामलों में भविष्य में इस तरह की लापरवाही दोहराई नहीं जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि संवेदनशील दस्तावेजों के साथ न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाना आवश्यक है। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता महिला को अपनी पहचान और निजी सामग्री की सुरक्षा के लिए फैमिली कोर्ट का रुख करने की अनुमति दी। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट से भी अनुरोध किया कि याचिका के साथ संलग्न निजी तस्वीरों को खुले न्यायिक रिकॉर्ड से हटाया जाए और उन्हें सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखा जाए, ताकि महिला की निजता और गरिमा की रक्षा सुनिश्चित हो सके। पीठ ने यह भी कहा कि भविष्य में महिला से जुड़े मामलों में ऐसी त्रुटियां नहीं होनी चाहिए और संवेदनशील दस्तावेजों को अदालत में पेश करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

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