राजधानी में 22 से 24 मई तक ट्रकों का ‘चक्का जाम’ होने जा रहा है, जिससे रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ट्रक ऑपरेटरों ने मालवाहक वाहनों पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) बढ़ाए जाने के विरोध में यह फैसला लिया है। इस हड़ताल का असर खासतौर पर फल-सब्जियों, दूध, दवाइयों और कपड़ा जैसे जरूरी सामानों की सप्लाई पर पड़ सकता है। दिल्ली में बड़ी मात्रा में ये सामान बाहरी राज्यों से ट्रकों के जरिए आता है, ऐसे में तीन दिन का ठप परिवहन बाजारों में कमी और कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन सकता है।

ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि ECC में बढ़ोतरी से उनकी लागत काफी बढ़ गई है, जिससे कारोबार प्रभावित हो रहा है। इसी के विरोध में उन्होंने यह चक्का जाम करने का निर्णय लिया है। यूनियनों ने यह भी चेतावनी दी है कि इस दौरान बाहरी राज्यों से किसी भी मालवाहक वाहन को दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। यह फैसला मालवाहक वाहनों पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) बढ़ाए जाने के विरोध में लिया गया है।

पंजाबी बाग में हुई अहम बैठक

ट्रक यूनियनों की यह रणनीतिक बैठक मंगलवार को दिल्ली के पंजाबी बाग में हुई, जिसमें दिल्ली-एनसीआर की कई ट्रक यूनियनें शामिल हुईं। बैठक में ऑटो और टैक्सी यूनियनों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। ऑल इंडिया मोटर्स ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश सभरवाल ने जानकारी दी कि सभी यूनियनों ने संयुक्त रूप से हड़ताल और चक्का जाम का निर्णय लिया है। इस आंदोलन के चलते दिल्ली में आने वाली जरूरी आपूर्ति जैसे फल, सब्जियां, दूध, दवाइयां और अन्य रोजमर्रा की वस्तुएं बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। यह फैसला ऑल इंडिया मोटर्स ट्रांसपोर्ट कांग्रेस और अन्य ट्रक यूनियनों की पंजाबी बाग में हुई बैठक के बाद लिया गया, जिसमें ऑटो और टैक्सी यूनियनें भी शामिल थीं।

किन फैसलों पर विरोध?

ट्रक यूनियनों ने मुख्य रूप से इन तीन फैसलों को लेकर आपत्ति जताई है दिल्ली में लोडिंग-अनलोडिंग करने वाले वाहनों पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) में बढ़ोतरी आगामी 1 नवंबर से BS-4 वाहनों के दिल्ली में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध  BS-6 वाहनों पर भी पर्यावरण मानकों को पूरा करने के बावजूद ECC लगाए जाने का फैसला यूनियनों का कहना है कि इन नीतियों से ट्रांसपोर्ट कारोबार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उनका दावा है कि जो वाहन पहले से ही BS-6 मानकों के तहत प्रदूषण नियंत्रण नियमों का पालन कर रहे हैं, उन पर भी शुल्क लगाना अनुचित है।

ट्रक यूनियनों का कहना है कि ECC केवल उन मालवाहक वाहनों पर लगाया जाना चाहिए जो दिल्ली को सिर्फ ट्रांजिट (पारगमन) रूट के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक, जो ट्रक दिल्ली में स्थानीय जरूरतों जैसे राशन, सब्जी, दूध और अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति के लिए आते हैं, उन पर यह शुल्क लगाना अनुचित है। यूनियनों का तर्क है कि ये वाहन सीधे दिल्ली के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, इसलिए उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना गलत है।

BS-4 वाहनों पर प्रतिबंध का विरोध

यूनियनों ने आगामी 1 नवंबर से BS-4 वाहनों के दिल्ली में प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंध का भी विरोध किया है। उनका कहना है कि इससे करीब 17 लाख वाहन प्रभावित होंगे। उनके अनुसार, इनमें से कई वाहन 2020 तक दिल्ली में पंजीकृत किए गए थे और कोरोना काल के दौरान लंबे समय तक उपयोग में नहीं रहे, जिससे उनका वास्तविक संचालन जीवन अभी केवल लगभग चार वर्ष का ही हुआ है। ट्रांसपोर्टर्स ने यह भी कहा कि BS-6 वाहनों को सरकार पहले ही पर्यावरण के अनुकूल मान चुकी है, इसके बावजूद उन पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क लगाना “तर्कसंगत नहीं” है।

आंदोलन और लंबा खिंचने की चेतावनी

ऑल इंडिया मोटर्स ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश सभरवाल ने कहा है कि सरकार यदि 1 नवंबर से वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने की तैयारी कर रही है, तो ट्रक ऑपरेटर पहले ही कुछ दिनों के लिए खुद ही दिल्ली में अपने वाहनों का प्रवेश बंद कर देंगे। सभरवाल के मुताबिक, यह कदम एक तरह का “सांकेतिक विरोध” होगा, जिससे सरकार को यह समझने का मौका मिलेगा कि दिल्ली की सप्लाई व्यवस्था में इन वाहनों की कितनी अहम भूमिका है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल शुरुआती तीन दिन का चक्का जाम होगा। यदि इसके बाद भी ट्रक यूनियनों की मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन को और लंबा और व्यापक किया जा सकता है। यह विरोध मुख्य रूप से पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC), BS-4 वाहनों पर प्रस्तावित प्रतिबंध और BS-6 वाहनों पर भी शुल्क लगाए जाने जैसे फैसलों को लेकर है। ट्रक यूनियनों का दावा है कि ये नीतियां ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर अनावश्यक आर्थिक दबाव डाल रही हैं।

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