रेणु अग्रवाल, धार। भोजशाला को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद में उच्च न्यायालय के फैसले के बाद Archaeological Survey of India (ASI) ने महत्वपूर्ण नया आदेश जारी किया है। इस आदेश में भोजशाला को उसकी मूल ऐतिहासिक पहचान वापस मिल गई है। ASI की नई विज्ञप्ति और प्रशासनिक आदेश में स्थल को अब “राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला” के रूप में संबोधित किया गया है। पूर्व में इस्तेमाल होने वाले “कमाल मौला मस्जिद” संबंधी उल्लेख को हटा दिया गया है।

365 दिनों निर्बाध पूजा का अधिकार

उच्च न्यायालय के हालिया आदेश के अनुपालन में ASI ने हिंदू समाज को भोजशाला परिसर में वर्ष के सभी 365 दिनों बिना किसी रोक-टोक के पूजा-अर्चना करने की अनुमति प्रदान कर दी है। इससे पहले पूजा केवल मंगलवार और बसंत पंचमी को सीमित थी।

पृष्ठभूमि

धार स्थित यह प्राचीन स्थल परमार वंश के महान राजा भोज की ज्ञान परंपरा और माँ सरस्वती के विद्या केंद्र के रूप में जाना जाता है। हिंदू पक्ष इसे माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता रहा है, जबकि लंबे समय से यह विवाद का विषय बना हुआ था। माननीय उच्च न्यायालय ने अपने हालिया फैसले में भोजशाला के ऐतिहासिक स्वरूप और हिंदू पूजा परंपरा को विशेष महत्व देते हुए ASI को आवश्यक निर्देश दिए थे। इसके बाद ASI ने तत्काल नई व्यवस्था लागू कर दी।

प्रशासनिक व्यवस्था

ASI के अधीन स्थल की संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी बनी रहेगी। इस फैसले से भोजशाला को उसकी मूल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान वापस मिलने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह निर्णय धार सहित पूरे मध्य प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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