Automobile Desk – नई गाड़ी खरीदते ही हम सबसे पहले उसकी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं और इसके लिए कॉम्प्रिहेंसिव मोटर इंश्योरेंस के साथ ‘जीरो डेप्रिसिएशन’ (Zero Dep) ऐड-ऑन जरूर लेते हैं। इस कवर का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि एक्सीडेंट की स्थिति में प्लास्टिक, फाइबर या मेटल के पार्ट्स बदलने पर जेब से पैसे नहीं देने पड़ते। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह गलतफहमी रहती है कि जीरो डेप्रिसिएशन कवर लेने के बाद वे साल में जितनी बार चाहें, उतने क्लेम पास करवा सकते हैं। अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो अपनी इस धारणा को थोड़ा सुधार लीजिए।

गाड़ी या बाइक इंश्योरेंस के बाजार में हर कंपनी के अपने अलग-अलग नियम और शर्तें होती हैं। साधारण भाषा में कहें तो ज्यादातर इंश्योरेंस कंपनियां एक पॉलिसी वर्ष के दौरान जीरो डेप्रिसिएशन ऐड-ऑन के तहत अधिकतम 2 क्लेम ही अप्रूव करती हैं। यानी अगर आपकी गाड़ी का एक ही साल में तीसरी बार एक्सीडेंट होता है, तो आपको सामान्य इंश्योरेंस के हिसाब से क्लेम मिलेगा और डेप्रिसिएशन का खर्च अपनी जेब से उठाना पड़ेगा।
हालांकि, यह दायरा सिर्फ दो क्लेम तक ही सीमित नहीं है। इंश्योरेंस एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बाजार में ऐसी कंपनियां भी मौजूद हैं जो एक साल में सिर्फ 1 क्लेम की इजाजत देती हैं, जबकि कुछ कंपनियां 2 या उससे भी ज्यादा क्लेम की सुविधा प्रदान करती हैं। कुछ प्रीमियम प्लान्स में कंपनियां ग्राहकों को ज्यादा बार क्लेम लेने का विकल्प देती हैं, लेकिन इसके लिए एक सीधी सी शर्त होती है—आपकी जेब पर एक्स्ट्रा प्रीमियम का बोझ।
यदि आप अपनी पॉलिसी में अनलिमिटेड या अधिक क्लेम की सुविधा जोड़ना चाहते हैं, तो इंश्योरेंस कंपनी आपसे साधारण जीरो डेप कवर के मुकाबले ज्यादा प्रीमियम चार्ज करेगी। कंपनियां जोखिम के हिसाब से अपना चार्ज तय करती हैं, इसलिए अगर क्लेम लेने की संख्या बढ़ेगी तो पॉलिसी की कीमत भी अपने आप बढ़ जाएगी।
बहुत से लोग छोटी-मोटी खरोंच या मामूली डेंट आने पर भी तुरंत Zero Dep Claim फाइल कर देते हैं। एक्सपर्ट्स की मानें तो यह एक बड़ी गलती है। छोटे-मोटे नुकसान के लिए क्लेम भुनाने से आपकी तय लिमिट खत्म हो जाती है। इसके अलावा, अगले साल मिलने वाला ‘नो क्लेम बोनस’ (NCB) भी हाथ से निकल जाता है। इसलिए छोटे खर्च खुद उठाना और बड़े नुकसान के लिए क्लेम बचाकर रखना ही समझदारी है।
जब भी आप किसी नई या पुरानी गाड़ी के लिए इंश्योरेंस पॉलिसी रिन्यू कराएं या नया कवर लें, तो सिर्फ प्रीमियम की रकम देखकर फैसला न करें। पॉलिसी एजेंट या कंपनी प्रतिनिधि से यह साफ-साफ पूछें कि उस पॉलिसी पीरियड में जीरो डेप्रिसिएशन क्लेम की लिमिट कितनी है। पॉलिसी डॉक्युमेंट के ‘Terms and Conditions’ वाले हिस्से को ध्यान से पढ़ना हमेशा फायदेमंद रहता है ताकि बाद में किसी भी तरह के असमंजस से बचा जा सके।

