Dharm Desk – सनातन धर्म में शनिदेव को कर्मफल दाता और न्याय के देवता कहा गया है। मान्यता है कि, व्यक्ति के जीवन में सुख-दुख और उतार-चढ़ाव के पीछे उसके कर्मों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही कारण है कि शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, महादशा या अंतर्दशा के समय लोग शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए पूजा, अनुष्ठान, दान और हवन करते है । हालांकि धार्मिक दृष्टि से केवल बाहरी पूजा-पाठ ही पर्याप्त नहीं मानी जाती है बल्कि उसके आचरण, व्यवहार और कर्म भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

शनिदेव के न्याय में कर्मों का सबसे बड़ा महत्व

शनि देव को न्यायप्रिय देवता है। वे इंसान के कर्मों के आधार पर फल प्रदान करते है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति एक ओर मंदिर में जाकर पूजा-अनुष्ठान करता है, वहीं दूसरी ओर अपने व्यवहार से किसी दूसरे के अधिकारों का हनन करता है। छल-कपट करता है या किसी को अनावश्यक कष्ट देता है, तो केवल धार्मिक अनुष्ठान कर लेने से उसके कर्मों का प्रभाव समाप्त नहीं होने वाला।

धार्मिक परंपरा में यह भी माना जाता है कि शनिदेव के आराध्य भैरव देव हैं। इसलिए किसी सिद्धपीठ, भैरव मंदिर या देवी मंदिर में पूजा करते समय भी साधक के आचरण और नीयत की पवित्रता को विशेष महत्व दिया जाता है।

किन कर्मों से शनिदेव होते हैं नाराज

  1. व्यक्ति के कुछ आचरणों को धार्मिक दृष्टि से अनुचित माना गया है। इनमें दूसरों का हक छीनना, छल-कपट करना, अन्यायपूर्ण व्यवहार करना और कमजोर या जरूरतमंद व्यक्ति का शोषण करना प्रमुख हैं। मजदूर, कर्मचारी या श्रमिक से काम करवाकर उसका उचित पारिश्रमिक रोकना भी अनुचित कर्म की श्रेणी में माना जाता है।
  2. इसी तरह माता-पिता और परिवार के सदस्यों का अपमान करना, निर्दोष व्यक्ति को कष्ट पहुंचाना और संबंधों में स्वार्थ तथा अहंकार रखना भी व्यक्ति के कर्मों को प्रभावित करने वाला माना गया है। खान-पान और जीवनशैली में अत्यधिक तामसिक प्रवृत्तियों को भी धार्मिक दृष्टि से सात्विक आचरण के विपरीत माना जाता है।

आडंबर से नहीं, आचरण से जुड़ी है कृपा

आज कई लोग जीवन में गलत कर्म करते हुए बड़े-बड़े हवन, यज्ञ और अनुष्ठान करवाते है। यह सोच लेना कि किसी मंदिर में पूजा कराने या महायज्ञ करवाने मात्र से किए गए सभी कर्मों का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, धार्मिक दृष्टि से ये उचित नहीं। पंडित या पुरोहित विधि-विधान से पूजा और अनुष्ठान संपन्न करा सकते हैं, लेकिन व्यक्ति के कर्म और आचरण उसके स्वयं के होते हैं। इसलिए शनिदेव की आराधना में पूजा के साथ सत्य, न्याय, ईमानदारी, संयम और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने को भी विशेष महत्व दिया जाता है।