सिंधु जल संधि को लेकर कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के ताजा फैसले पर भारत ने बेहद सख्त रुख अपनाया है. विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि भारत न केवल इस फैसले को अस्वीकार करता, बल्कि जिस निकाय ने इसे सुनाया है, उसकी वैधता को भी पूरी तरह खारिज करता है. भारत के मुताबिक, यह निकाय संधि की शर्तों के उल्लंघन में गठित किया गया था और इसलिए इसके किसी भी आदेश या फैसले का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि इस अवैध रूप से गठित निकाय ने सिंधु जल संधि और अंतरिम उपायों से जुड़े मुद्दों पर अपना तथाकथित फैसला जारी किया है. लेकिन भारत का रुख पहले की तरह स्पष्ट है. इस निकाय के पास भारत के संप्रभु फैसलों पर आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है.

पाकिस्तान ने खूब उठाया भारत की दरियादिली का फायदा

सालों तक जिस ’80-20 रूल’ के दम पर पाकिस्तान मुगालते में रहा और अपनी अर्थव्यवस्था चलाता रहा, आज वही रूल भारत का सबसे बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक शील्ड बन गया है. पहलगाम में जब पाकिस्तानी आतंकियों ने बेकसूर टूरिस्टों का खून बहाया, तो भारत ने संदेश दे दिया कि बिना गोलियां चलाए भी दुश्मन को घुटनों पर लाया जा सकता है. सिंधु जल संधि को सस्पेंड करते ही इस्लामाबाद के हुक्मरानों की नींद उड़ गई है. वो समझ चुके हैं कि भारत ने अगर इस 80 फीसदी पानी की टोटियां थोड़ी भी कस दीं, तो पाकिस्तान में न तो अनाज उगेगा और न ही बिजली बनेगी.

कैसे पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी बना ’80-20′ का गणित?

इस पूरे गेम प्लान को समझने के लिए पानी के बहाव और भूगोल को देखना होगा. 1960 में हुई सिंधु जल संधि के तहत 6 नदियों का बंटवारा हुआ था.यहां पेंच ये है कि ये तीनों पश्चिमी नदियां भारत के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से होकर ही पाकिस्तान में दाखिल होती हैं. यानी नदियां अपस्ट्रीम में भारत के पास हैं और पाकिस्तान डाउनस्ट्रीम में बैठा है.

जब तक भारत मेहरबान था, तब तक ये 80 फीसदी पानी पाकिस्तान के लिए ‘मुफ्त की खैरात’ बना रहा. लेकिन जैसे ही भारत ने कड़ा रुख अपनाया, पाकिस्तान को एहसास हुआ कि उसने अपनी 80% लाइफलाइन की चाबी उस भारत के हाथ में दे रखी है, जिसे वो लगातार जख्म देता आ रहा था.

4 तरफ से पाकिस्तान को कैसे घेर सकता है भारत?

भारत के पास इस 80-20 रूल को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के कई मजबूत कूटनीतिक और तकनीकी रास्ते हैं.

वॉटर होल्डिंग कैपेसिटी और डायवर्जन : पश्चिमी नदियों में बहने वाला 80 फीसदी पानी बहुत विशाल है. भारत अगर पश्चिमी नदियों पर अपनी रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं का तेजी से विस्तार करे और गाद निकालने के नाम पर या जलाशयों के जरिए पानी के बहाव को कुछ दिनों के लिए भी रोक दे या धीमा कर दे तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में सूखे जैसी स्थिति बन जाएगी.

‘20% पूर्वी नदियों’ का एक-एक कतरा रोकना: अब तक तकनीक और बांधों की कमी के कारण सतलुज, रावी और ब्यास का कुछ पानी बिना इस्तेमाल हुए पाकिस्तान की तरफ चला जाता था. भारत अब शाहपुर कंडी बांध और उज्ज प्रोजेक्ट जैसे बांधों के जरिए अपने हिस्से के 20% पानी की एक-एक बूंद रोक रहा है. इस पानी को नहरों के जरिए पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों तक पहुंचाया जा रहा है, जिससे पाकिस्तान को मिलने वाला अतिरिक्त पानी पूरी तरह बंद हो गया है.

बिजली और कृषि पर सीधा स्ट्राइक: पाकिस्तान का 80% कृषि क्षेत्र और उसके सबसे बड़े तरबेला व मंगला डैम इसी 80% पानी पर टिके हैं. अगर भारत संधि की समीक्षा करते हुए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके चिनाब और झेलम पर रन-ऑफ-द-रिवर प्रोजेक्ट्स बढ़ा देता है तो पाकिस्तान में फसलें सूखने लगेंगी और उसकी बिजली व्यवस्था ठप हो जाएगी. पाकिस्तान के पास इसका कोई विकल्प नहीं है.

लीगल और जियोपॉलिटिकल प्रेशर: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी पाकिस्तान रोना रोता है, भारत इसी 80-20 के आंकड़े को सामने रखता है. भारत दुनिया को दिखाता है कि ऊपरी राज्य होने के बावजूद भारत ने 64 सालों तक 80% पानी पड़ोसी को दिया. लेकिन जब पड़ोसी देश पानी के बदले आतंकवाद निर्यात करे तो कोई भी देश अपनी सुरक्षा के लिए उस संधि की शर्तों को बदलने का पूरा हक रखता है.

तीन-तीन युद्ध लड़े, फिर भी भारत ने कभी पानी नहीं रोका

पूरी दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता जहाँ दो देश आपस में खूनी जंग लड़ रहे हों, लेकिन एक देश दूसरे देश का पानी न रोके.

1965 का युद्ध: पाकिस्तान ने भारत पर अचानक हमला कर दिया, लेकिन भारत ने पानी की सप्लाई रोककर पाकिस्तान की आम जनता को प्यासा नहीं मारा.

1971 की जंग: जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बना दिया, तब भी सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान की तरफ बहता रहा.

1999 का कारगिल युद्ध: जब पाकिस्तानी सेना की शह पर आतंकी कारगिल की बर्फीली चोटियों पर कब्जा जमाए बैठे थे, तब भी भारत ने इस संधि की शर्तों का ईमानदारी से पालन किया.

पानी की हर बूंद का हिसाब, नए भारत का नया रूल

’80-20 का रूल’ जो कल तक भारत की दरियादिली का प्रतीक था, आज भारत का सबसे बड़ी शील्ड बन चुका है. भारत ने अपनी भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान को ये समझा दिया है कि भारत का पानी पीना और भारत के ही बेकसूर लोगों का खून बहाना अब एक साथ नहीं चलेगा. अगर पाकिस्तान को नदियां और अपना मुल्क बचाना है तो उसे आतंकी फैक्ट्रियों पर ताला लगाना ही होगा. ’80-20′ के खेल में अब बाजी भारत के हाथ में है और पाकिस्तान इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ चुका है.

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