हेमंत शर्मा, इंदौर। 16 करोड़…से लेकर 53 करोड़… और अब सवाल करोड़ों की उस बोली पर, जिसने बहस छेड़ दी है। आखिर क्या धर्म में करोड़ों की बोलियां लगाने की परंपरा है? क्या मंगल कलश जैन धर्म का अनिवार्य हिस्सा है? और धर्म के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये कहां खर्च होते हैं? इन सवालों पर पहली बार जैन समाज के वरिष्ठ धर्मगुरु आचार्य सुनील सागर महाराज ने लल्लूराम डॉट कॉम से खुलकर बातचीत की। आचार्य सुनील सागर महाराज ने साफ कहा कि जैन धर्म के मूल सिद्धांतों में कहीं भी मंगल कलश स्थापना का उल्लेख नहीं मिलता। यह परंपरा धर्म की नहीं बल्कि समय के साथ बड़े धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था के लिए शुरू हुई।

ये भी पढ़ें: धर्मगुरुओं की ‘फूहड़ बयानबाजी’ पर आचार्य सुनील सागर का प्रहार: बोले-‘सरकार दिखाए दूरदर्शिता, किसी को भाईचारा बिगाड़ने का हक नहीं’

करोड़ों की बोली, पूरे शहर में चर्चा

सूत्रों के अनुसार चतुर्मास आयोजन में कलश स्थापना के लिए एक के बाद एक बोलियां लगती गईं। सबसे बड़ी बोली सपना मनीष गोधा और नवीन आनंद गोधा की ओर से 16 करोड़ 16 लाख रुपये की रही। इसके अलावा अन्य कलशों के लिए भी 5 करोड़, 3 करोड़ 55 लाख, 3 करोड़ 33 लाख और 2 करोड़ से अधिक की बोलियां लगीं। कुल मिलाकर यह आंकड़ा लगभग 53 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

“धर्म में नहीं, समाज ने शुरू की थी मंगल कलश की परंपरा”

आचार्य सुनील सागर महाराज ने बताया कि करीब 50 से 70 वर्ष पहले जब बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन होने लगे, तब उनके खर्च की व्यवस्था के लिए समाज ने मंगल कलश की परंपरा शुरू की। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार राशि देते थे ताकि भोजन, प्रवचन, साधु-संतों की व्यवस्था और अन्य धार्मिक कार्य सुचारु रूप से चल सकें।

उन्होंने कहा कि शुरुआत में यह श्रद्धा और सहयोग का प्रतीक था लेकिन धीरे-धीरे इसकी बोली लगने लगी और अब यह करोड़ों तक पहुंच गई है। उन्होंने बताया कि धर्म में कहीं नहीं लिखा कि मंगल कलश रखना अनिवार्य है। यह समय के साथ शुरू हुई व्यवस्था है, धर्म का मूल सिद्धांत नहीं।

53 करोड़ की बोली… अब संभालना भी मुश्किल

आचार्य ने कहा कि पहले लाखों रुपये तक की राशि से धार्मिक आयोजन आराम से संपन्न हो जाते थे लेकिन अब करोड़ों की बोलियां लग रही हैं। उन्होंने माना कि आज इसका स्वरूप इतना बड़ा हो गया है कि इसे संभालना भी आसान नहीं रह गया। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी राशि देखकर स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में सवाल उठते हैं कि आखिर इतना पैसा कहां से आता है और उसका उपयोग किस तरह होता है।

धर्म के नाम पर आने वाले धन पर हो निगरानी

आचार्य सुनील सागर महाराज ने धार्मिक संस्थाओं में आर्थिक पारदर्शिता की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु विश्वास और आस्था के साथ दान देते हैं, इसलिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उस धन का उपयोग किन कार्यों में किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर करोड़ों रुपये किसी धार्मिक आयोजन में आ रहे हैं तो उसके उद्देश्य और उपयोग की जानकारी समाज के सामने भी होनी चाहिए। धर्म के नाम पर लोग पैसा देते हैं तो उसका सदुपयोग होना चाहिए। ऐसे मामलों में निगरानी भी जरूरी है और उद्देश्य भी स्पष्ट होना चाहिए।

ये भी पढ़ें: CPCT की बाध्यता पर आर-पार: 10 अगस्त को मंत्रालय के बाहर आखिर क्या करने वाले हैं 55 जिलों के कर्मचारी?

दिखावा ज्यादा दिखाई देने लगा

आचार्य सुनील सागर महाराज ने कहा कि धार्मिक आयोजनों में सेवा और साधना से ज्यादा अब दिखावे की चर्चा होने लगी है। उनका कहना था कि धर्म का केंद्र त्याग, तप, संयम और आत्मकल्याण होना चाहिए, न कि करोड़ों की बोलियां और रिकॉर्ड। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक आयोजन समाज, शिक्षा, गौशालाओं, गरीबों के भोजन, चिकित्सा और जनकल्याण के लिए काम करें तो उसका वास्तविक लाभ समाज को मिलेगा।

अगर पैसा समाज के काम आए तो स्वागत योग्य

आचार्य ने कहा कि यदि करोड़ों रुपये का उपयोग मेडिकल कॉलेज, शिक्षा, अस्पताल, गौशालाओं या अन्य सामाजिक कार्यों में हो रहा है तो यह अच्छी बात है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें संबंधित आयोजन की पूरी जानकारी नहीं है इसलिए वे उसके उपयोग पर अंतिम टिप्पणी नहीं करेंगे। उन्होंने केवल इतना कहा कि समाज को यह भरोसा मिलना चाहिए कि धर्म के नाम पर आया पैसा समाज के हित में खर्च हो रहा है।

बड़ी राशि आए तो सवाल भी उठेंगे

आचार्य सुनील सागर महाराज ने कहा कि जब किसी धार्मिक आयोजन में करोड़ों रुपये की चर्चा होती है तो लोगों का सवाल पूछना भी स्वाभाविक है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं को खुद आगे आकर पारदर्शिता दिखानी चाहिए ताकि किसी तरह का भ्रम या विवाद पैदा न हो।

ये भी पढ़ें: 2 लाख पद खाली, युवा परेशान! यूथ कांग्रेस का बड़ा ऐलान- शुरू होगा “भर्ती दो, मध्य प्रदेश बचाओ” अभियान

धर्म का संदेश क्या है?

बातचीत के अंत में आचार्य ने कहा कि धर्म का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा या रिकॉर्ड बनाना नहीं है। धर्म का उद्देश्य समाज को जोड़ना, सेवा करना और आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाना है। यदि धार्मिक परंपराएं इन मूल्यों को मजबूत करती हैं तो उनका स्वागत होना चाहिए लेकिन यदि चर्चा केवल करोड़ों की बोलियों तक सीमित रह जाए तो धर्म का मूल संदेश पीछे छूट सकता है। 53 करोड़ के मंगल कलश को लेकर उठे सवालों के बीच जैन धर्मगुरु का यह बयान अब एक नई बहस को जन्म दे रहा है। सवाल सिर्फ रिकॉर्ड बोली का नहीं, बल्कि उस आस्था, पारदर्शिता और धर्म के वास्तविक स्वरूप का है, जिस पर करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास टिका हुआ है।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m