हेमंत शर्मा, इंदौर। नगर निगम से जुड़े करीब 150 करोड़ रुपये के कथित फर्जी बिल घोटाले की जांच अब अदालत में भी सवालों के घेरे में है। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और कथित भ्रष्टाचार से जुड़े पहलुओं की जांच कर रहा है। जांच के दौरान करीब 103 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी सामने आने का दावा किया गया है।मामले में ED ने कुल 32 लोगों को आरोपी बनाया है, जबकि अब तक राघव राठौर, राहुल बड़ेरा और मोहम्मद जाकिर की गिरफ्तारी की गई है। तीनों जेल में हैं।
₹48 करोड़ के भुगतान पर ED की नजर
जांच में मेसर्स किंग, मेसर्स ग्रीन कंस्ट्रक्शन और मेसर्स न्यू कंस्ट्रक्शन से जुड़े करीब 48 करोड़ रुपये के भुगतान का जिक्र सामने आया है। आरोप है कि फर्जी आदेश, टेंडर और बिलों के आधार पर निगम से भुगतान हासिल किया गया। ED के मुताबिक, इस राशि में से किंग कंपनी को करीब 13.18 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ। जांच एजेंसी ने इन लेनदेन को कथित कमीशन व्यवस्था से जोड़कर देखा है।
50 फीसदी कमीशन का आरोप, 15 फीसदी किसके हिस्से?
मामले में सबसे गंभीर आरोप कथित कमीशन के बंटवारे को लेकर हैं। ED की जांच में आरोप लगाया गया कि अभय राठौर 50 फीसदी और अकाउंटेंट राजकुमार सालवी 15 फीसदी कमीशन लेते थे।जांच एजेंसी का दावा है कि कथित कमीशन की पूरी राशि संबंधित लोगों तक नहीं पहुंची और इसी आधार पर संपत्ति जब्त किए जाने की कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।लेकिन इस पूरे दावे पर अब न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जाकिर की जमानत खारिज, कोर्ट में ED की जांच पर सवाल
मामले में मोहम्मद जाकिर की जमानत याचिका भी खारिज हो चुकी है। वहीं जिला अदालत में सुनवाई के दौरान ED की जांच को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सवाल सामने आए।अदालत में यह बात उठी कि जांच में 32 लोगों को आरोपी बनाया गया है, लेकिन गिरफ्तारियां केवल तीन लोगों की हुई हैं और बाकी सह-अभियुक्तों के खिलाफ अलग स्थिति क्यों है।हालांकि अदालत में हुई दलीलों और आरोपों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है।
50% कमीशन’ लेने का आरोप, लेकिन गिरफ्तारी नहीं- यहीं उठ रहा सवाल
अदालत के सामने यह भी तर्क रखा गया कि ED की जांच में राठौर पर 50 प्रतिशत और सालवी पर 15 प्रतिशत कमीशन लेने का आरोप लगाया गया है, लेकिन सालवी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।यही बिंदु अब जांच की निष्पक्षता और सभी आरोपियों के खिलाफ अपनाई गई कार्रवाई को लेकर चर्चा में है।
32 आरोपी, लेकिन जांच का दायरा कितना बड़ा?
ED की चार्जशीट में जिन 32 आरोपियों के नाम बताए गए हैं, उनमें मोहम्मद जाकिर, मोहम्मद साजिद, मोहम्मद सिद्दीकी, राहुल बड़ेरा, रेणु बड़ेरा, एहतशाम खान, आलिया खान, विलियम्स खान, मोहम्मद असलम खान, मौसम व्यास, इमरान खान, मोहम्मद जाहिद खान, राजेंद्र शर्मा, अभय सिंह राठौर, मनीष धारण कर्ता, राजकुमार सालवी, करण सिरोहिया, समर सिंह परमार, अनिल कुमार गर्ग, शरद कतरोलिया, अरुण शुक्ला, रामेश्वर परमार, उदय सिंह भदौरिया, जगत सिंह ओहरिया, जगदीश चंद्र चौकसे, चेतन सिंह भदौरिया, अर्पित जैन, आयुष जैन, उषा जैन, मनोज माऊ, यश गज्झर और रमेश रंगटा शामिल बताए गए हैं।
₹150 करोड़ के बिल और ₹103 करोड़ की कथित गड़बड़ी—आखिर सच क्या?
इस पूरे मामले में दो आंकड़े खास तौर पर ध्यान खींच रहे हैं—करीब ₹150 करोड़ के फर्जी बिलों की जांच और ED द्वारा जांच में ₹103 करोड़ की कथित गड़बड़ी का सामने आना।अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि निगम से भुगतान कैसे हुआ, बल्कि सवाल यह भी है कि—
फर्जी बिल किसने तैयार किए?
भुगतान की मंजूरी किस स्तर पर हुई?
कमीशन की रकम आखिर कहां गई?
और अगर 32 लोग आरोपी हैं तो पूरे नेटवर्क में किसकी क्या भूमिका थी?
नगर निगम से जुड़े इस कथित घोटाले ने एक बार फिर सरकारी भुगतान व्यवस्था, टेंडर प्रक्रिया और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।हालांकि मामले में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं और अंतिम दोष सिद्धि अदालत के फैसले के बाद ही मानी जाएगी।
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