Success should not go to your head, failure should not be left in your heart… सफलता और असफलता के ताने बाने से गुथे जीवन में अक्सर लोग सफलता मिलते ही अहंकार में डूब जाते हैं और असफलता मिलते ही निराशा के गर्त में खो जाते हैं। बुद्धिमत्ता इसमें है कि सफलता को न अपने सिर पर न चढ़ने दें और न ही असफलता को अपने दिल में जगह बनाने दें।

आत्मविश्वास से भर देने वाली सफलता घमंड का चोला पहन कर प्रगति को बाधित करती है। देखा गया है कि अपनी उपलब्धियों पर इतराने वाले सीखना तत्काल बंद कर देते हैं। असफलता हमें बहुत कुछ सिखाती है लेकिन यदि इसे दिल से लगा लिया जाए यह कमजोर बना कर आगे बढ़ने की क्षमता को खत्म कर देती है। इंसान को चाहिए कि वे सफलता के समय विनम्र और असफलता के समय मजबूत बने रहें। सफलता और असफलता के बीच का यही मानसिक संतुलन हमें एक बेहतर इंसान बनाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ‘स्थितप्रज्ञ’ (स्थिर बुद्धि वाले) मनुष्य के लक्षण बताते हुए कहते हैं –

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

अर्थात् दुख मिलने पर जिसके मन में कोई उद्वेग, घबराहट या बेचैनी नहीं होती, सुख की प्राप्ति होने पर भी जो इच्छा या लालसा से मुक्त रहता है। जिसके मन से राग, लगाव, आसक्ति, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं। ऐसा ही मननशील (विचारवान) मनुष्य ‘स्थिर बुद्धि वाला’ (स्थितप्रज्ञ) कहलाता है।

कहा जा सकता है कि जीवन की असली जीत इसी में है कि हम परिस्थितियों से प्रभावित होने के बजाय उनसे सीखें और आगे बढ़ें। जब हम सफलता के मद को सिर में चढ़ने से और असफलता के क्षोभ को दिल में उतरने से रोक पाने में सफ़ल हो जाते हैं तब ही हम अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकते हैं।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ / लल्लूराम डॉट कॉम

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