अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवगठित मऊगंज जिले से भ्रष्टाचार का एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसे सुनकर आप भी दंग रह जाएंगे। क्या आपने कभी सुना है कि जिस गौशाला की दीवारें अभी खड़ी ही हो रही हों, जिसका निर्माण कार्य आधा-अधूरा हो, वहां कागजों पर 600 से ज्यादा गायों को पालकर सरकारी खजाने से 59 लाख रुपये से ज्यादा की राशि साफ कर दी जाए?

जी हां, यह पूरा खेल मऊगंज जिले के हनुमना जनपद पंचायत अंतर्गत बेलहा गांव की शासकीय गौशाला का है। जहां भ्रष्टाचार के पुराने आरोपी सरपंच और अधिकारियों की मिलीभगत से इस ‘कागजी गौशाला’ का संचालन दिखाकर लाखों का चूना लगाया गया है।

स्थानीय लोगों और खुद सरपंच मंटू कोल की मानें, तो इस गौशाला का काम अभी भी अधूरा है और इसे पूरा होने में कम से कम 6 महीने का वक्त और लगेगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिस गौशाला का अभी अस्तित्व ही पूरा नहीं हुआ, उसके नाम पर सरकारी खजाने से कुल 59 लाख 42 हजार रुपये का भुगतान करा लिया गया। यह भुगतान गौवंश की देखरेख, चारे और भूसे के नाम पर किया गया है।

इस महाघोटाले की परतें तब खुलीं जब गांव के ही एक सजग नागरिक ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी। डिप्टी डायरेक्टर जे.एल. साकेत के कार्यालय से जारी पत्र क्रमांक 253, दिनांक 23 अक्टूबर 2025 के जवाब में साफ लिखा गया था कि गौशाला क्रमांक 1 व 2 का संचालन ‘सारदा स्व सहायता समूह’ द्वारा किया जा रहा है, लेकिन अनुदान राशि अभी जारी नहीं की गई है। 

चौंकाने की बात यह है कि इस जवाब के आने के ठीक अगले ही महीने 42 लाख 57 हजार 800 रुपये की भारी-भरकम राशि जारी कर दी गई। इसके अलावा, शेष 16 लाख 85 हजार रुपये की राशि के आहरण की जानकारी खुद गौशाला संचालक और सरपंच मंटू कोल ने साझा की है।

भ्रष्टाचार का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता। ग्रामीणों ने इस फर्जीवाड़े की कई बार शिकायत की, ब्लॉक बिटनरी ऑफिसर के द्वारा जांच कर पंचनामा भी बनाया गया कि मौके पर एक भी गौवंश नहीं है। खुद क्षेत्रीय विधायक प्रदीप पटेल ने डिप्टी डायरेक्टर जे.एल. साकेत की मौजूदगी में जब इस निर्माणाधीन गौशाला का निरीक्षण किया था, तब भी वहां कोई गौवंश मौजूद नहीं मिला।

हद तो तब हो गई जब 24 अप्रैल 2026 को स्वयं डिप्टी डायरेक्टर जे.एल. साकेत ने दोबारा निरीक्षण किया, तो निर्माणधीन गौशाला में केवल 22 गायें ही मिलीं। इसके बावजूद, पोर्टल पर दर्ज 611 गौवंश के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान लगातार निकाला जाता रहा।

सवाल यह उठता है कि जिस सरपंच मंटू कोल और पूर्व सचिव रामधनी मिश्रा पर पूर्व में गौशाला निर्माण में चरागाह न बनाने और भ्रष्टाचार करने के कारण 4 लाख 50 हजार रुपये की रिकवरी यानी वसूली अधिरोपित की गई थी, उसी दागी सरपंच के हाथों में  इस निर्माणाधीन अधूरी गौशाला का संचालन आखिर क्यों सौंप दिया गया?

आपको बता दें कि यह पूरी व्यवस्था उन्हीं डिप्टी डायरेक्टर जे.एल. साकेत के अधीन आती है, जो खुद कुछ समय पहले चेक के जरिए 7 लाख रुपये की रिश्वत लेने के संगीन आरोपों में घिरे थे। आरोप था कि रिश्वत के इस पैसे से उन्होंने अपने बेटे के नाम रीवा में एक मकान खरीदा था।

जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और जांच करने वाले खुद भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हों, तो कार्रवाई की उम्मीद किससे की जाए? निर्माणाधीन गौशाला में कागजों पर 611 गायों को दिखाकर सरकारी पैसे का बंदरबांट करना सीधे तौर पर मऊगंज प्रशासन और पशुपालन विभाग की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद मऊगंज के आला अधिकारी क्या कदम उठाते हैं, या फिर कागजी गायों के नाम पर पैसों का यह आहरण इसी तरह जारी रहेगा।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m