कैथल: देशभर में जहां रक्षाबंधन पर भाई-बहन के प्रेम का उत्सव मनाया जाता है, वहीं हरियाणा के कैथल जिले का सिरसल गांव ऐसा भी है, जहां कई परिवार करीब 400 साल से इस त्योहार से दूरी बनाए हुए हैं। गांव में रक्षाबंधन पर न तो बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और न ही इस दिन उत्सव का माहौल रहता है। इसके पीछे ग्रामीणों की अलग-अलग ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

रक्षाबंधन के दिन नरसंहार की मान्यता
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, शांडिल्य गोत्र के ब्राह्मण परिवारों में रक्षाबंधन न मनाने की परंपरा औरंगजेब के शासनकाल से चली आ रही है। ग्रामीणों की मान्यता है कि उनके पूर्वजों के पास एक बेहद सुंदर घोड़ी थी, जिस पर तत्कालीन शासक की नजर पड़ गई थी।
बताया जाता है कि शासक ने घोड़ी की मांग की, लेकिन पूर्वजों ने उसे देने से इनकार कर दिया। इससे नाराज होकर रक्षाबंधन के दिन गांव के लोगों को भोज के बहाने बुलाया गया। ग्रामीणों के मुताबिक, इसी दौरान पुरुषों और महिलाओं का नरसंहार कर दिया गया। कुछ लोग अपनी जान बचाकर वहां से निकल गए और बाद में 84 क्षेत्र में जाकर बस गए।
गांव की मान्यता है कि इस घटना की याद में शांडिल्य गोत्र के परिवारों ने रक्षाबंधन मनाना छोड़ दिया।
गर्भवती महिला की बची जान, बेटे का नाम रखा आसकरण
इस परंपरा से जुड़ी एक मार्मिक कहानी भी ग्रामीणों के बीच प्रचलित है। बताया जाता है कि नरसंहार के समय गांव की एक ब्राह्मण महिला गर्भवती थी और अपने मायके गई हुई थी। इसी वजह से उसकी जान बच गई।
बाद में उसके घर बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम आसकरण रखा गया। ग्रामीणों के अनुसार, सिरसल के शांडिल्य गोत्र के ब्राह्मण परिवार खुद को उसी आसकरण का वंशज मानते हैं। पूर्वजों की मौत की स्मृति में आज भी कई परिवार रक्षाबंधन के दिन को शोक दिवस की तरह देखते हैं।
रोड बिरादरी भी नहीं मनाती थी रक्षाबंधन
सिरसल में रक्षाबंधन न मनाने की दूसरी कहानी रोड बिरादरी से भी जुड़ी बताई जाती है। बुजुर्ग कृष्ण कुमार के अनुसार, उनके पूर्वज दिल्ली के पास बादली क्षेत्र में रहते थे। मान्यता है कि तत्कालीन बादशाह ने एक लड़की का डोला मांग लिया था। इसका विरोध करने पर संघर्ष हुआ।
ग्रामीणों के अनुसार, रोड बिरादरी के लोग रक्षाबंधन के दिन पारंपरिक रूप से हथियारों की पूजा करते थे और उस दिन हथियार नहीं उठाते थे। इसी का फायदा उठाकर शासक के सैनिकों ने उनके पूर्वजों पर हमला कर दिया और कई लोगों की हत्या कर दी।
बताया जाता है कि कुछ लोग जान बचाकर वर्तमान करनाल, कैथल और कुरुक्षेत्र क्षेत्र में आकर बस गए। इसके बाद रोड बिरादरी के लोगों ने भी रक्षाबंधन मनाना छोड़ दिया।
समय के साथ कुछ परिवारों ने बदली परंपरा
करीब चार सदियों पुरानी बताई जाने वाली यह परंपरा आज भी सिरसल के कई परिवारों में कायम है। हालांकि समय के साथ बदलाव भी आया है। गांव से बाहर रहने वाले और कुछ स्थानीय परिवार अब रक्षाबंधन मनाने लगे हैं।
इसके बावजूद शांडिल्य गोत्र और रोड बिरादरी के अनेक परिवार आज भी इस दिन को उत्सव के बजाय अपने पूर्वजों की स्मृति से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों पुरानी एक ऐसी परंपरा है, जिसे वे अपने पूर्वजों की याद में आज तक निभाते आ रहे हैं।
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