शब्बीर अहमद, भोपाल। मध्यप्रदेश निकाय चुनाव में अभी एक साल बाकी है, लेकिन कांग्रेस ने तैयारी शुरू कर दी है। इस बार पार्टी का फॉर्मूला है- बी फॉर्म के साथ बांड भी। पिछले चुनाव में जबलपुर, छिंदवाड़ा और मुरैना के महापौर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए थे। उसी डर से कांग्रेस अब टिकट से पहले नेताओं की निष्ठा की गारंटी चाहती है। सवाल बड़ा है कि क्या कागज का ये बांड नेताओं को बांध पाएगा ?
कांग्रेस का नया मिशन है दलबदल रोकना, इसके लिए 16 बड़े नगर निगम और प्रमुख नगरपालिकाओं में वरिष्ठ नेताओं को टास्क दिया गया है। काम साफ है – ऐसे उम्मीदवार ढूंढो जो जीत के बाद भी पार्टी न छोड़ें। पिछली बार कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा था। कांग्रेस के टिकट पर जीते जबलपुर, छिंदवाड़ा और मुरैना के महापौर बाद में भाजपा में शामिल हो गए। इसी वजह से अब कांग्रेस टिकट बांटने का पैमाना बदल रही है।
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निकाय का रिजल्ट तय करेगा विधानसभा की दिशा!
जीत की क्षमता के साथ अब वैचारिक प्रतिबद्धता भी देखी जाएगी। पार्टी को लगता है कि निकाय चुनाव का रिजल्ट विधानसभा की दिशा तय करेगा। विधानसभा चुनाव के करीब 1 साल पहले होने वाले नगरीय निकाय चुनाव को एमपी की सियासत में सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जाता है, इसलिए कांग्रेस अभी से चुनावी रणनीति बनाने में जुट गई है।
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निकाय चुनाव दूर हैं, लेकिन कांग्रेस का डर करीब है, पार्टी को डर है कि भाजपा कहीं फिर उसके जीते हुए प्रत्याशी न हाईजैक कर ले, इसी डर की काट के लिए कांग्रेस अब बांड का फॉर्मूला लाई है। मकसद साफ है कि जीतने के बाद नेता पार्टी की लाइन क्रॉस न करें। लेकिन सियासत में बांड की स्याही कितनी पक्की होती है, ये तो वक्त बताएगा।

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