शिखिल ब्यौहार, भोपाल। आगामी मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश की सियासत में एक बार फिर किसानों का मुद्दा गरमाने लगा है। लेकिन इस बार आंदोलन का चेहरा और मिजाज पूरी तरह बदल चुका है, जो सरकार और जिम्मेदारों के लिए सबसे बड़ी चुनावी चुनौती बनने जा रहा है। पहले जहां किसान अपनी मांगों को लेकर राजधानी या प्रदेश स्तर पर बड़ा हल्ला बोलते थे, वहीं अब आंदोलन का स्वरूप पूरी तरह ‘क्षेत्रीय और स्थानीय’ हो चुका है। किसान अब अपनी स्थानीय समस्याओं को लेकर छोटे-छोटे गुटों में हर तहसील और जिले में मोर्चा खोल रहे हैं। सियासत में अभी भले ही धुआं दिख रहा हो, लेकिन अगर यह आग भड़की तो चुनाव के सारे समीकरण और मुद्दे पलक झपकते ही बदल जाएंगे।

2 साल से हर दूसरे दिन हुआ आंदोलन!

विधानसभा के दौरान सरकार द्वारा दिए गए एक प्रश्न के लिखित जवाब में जो आंकड़े सामने आए हैं, उसने प्रशासनिक अमले की नींद उड़ा दी है। मध्य प्रदेश में बीते 2 सालों में किसान आंदोलनों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि बीते दो वर्षों में हर महीने करीब 25 आंदोलन दर्ज किए गए हैं, यानी प्रदेश में हर दूसरे दिन एक आंदोलन हो रहा है। ये सभी आंदोलन किसी एक बड़े नेता के आह्वान पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और जमीनी मुद्दों जैसे खाद-बीज, फसल खरीदी के आधार पर स्थानीय स्तर पर किए गए हैं।

कहां कितने हुए कुछ प्रमुख आंदोलन..

सागर में 76 आंदोलन: यहां सबसे ज्यादा प्रदर्शन हुए हैं। इनमें भारतीय किसान श्रमिक जनशक्ति यूनियन ने 41, भारतीय किसान संघ ने 9 और किसान कांग्रेस ने 1 आंदोलन का नेतृत्व किया।

खरगोन में 61 आंदोलन: इस निमाड़ क्षेत्र के जिले में राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ 31 आंदोलनों के साथ सबसे आगे रहा। इसके अलावा भारतीय किसान संघ ने 15 और कांग्रेस ने 3 आंदोलनों को हवा दी।

ग्वालियर में 44 आंदोलन: चंबल-ग्वालियर बेल्ट में ‘मध्य प्रदेश किसान सभा’ ने 14, भारतीय किसान संघ ने 11 और संयुक्त किसान मोर्चा ने 6 प्रदर्शन किए।

नरसिंहपुर में 38 आंदोलन: महाकौशल के इस जिले में भारतीय किसान संघ के 14, भारतीय किसान यूनियन के 12, राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के 7 और मध्य प्रदेश किसान सभा के 3 आंदोलन हुए।

खंडवा में 38 आंदोलन: यहां संयुक्त कृषक संगठन ने 13, भारतीय किसान संघ ने 12 और ‘राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ’ ने 3 आंदोलन किए।

रीवा में 38 आंदोलन: विंध्य क्षेत्र के रीवा में संयुक्त किसान मोर्चा ने सबसे ज्यादा 19 आंदोलनों की कमान संभाली, जबकि भारतीय किसान यूनियन ने 9 और में भारतीय किसान संघ ने 5 आंदोलन किए।

कटनी में 35 आंदोलन: यहां भारतीय किसान संघ ने 13, संयुक्त किसान मोर्चा ने 4, कांग्रेस ने 3 और भारतीय किसान यूनियन ने 3 आंदोलनों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

अधिकारी कंफर्ट जोन में, भुगतने होंगे गंभीर परिणाम: किसान संगठन

भारतीय किसान संघ के प्रांत प्रचार प्रसार प्रमुख राहुल धूत ने प्रशासनिक तंत्र पर सीधा हमला बोलते हुए चेतावनी दी है। उनका कहना है कि मध्य प्रदेश की हर तहसील और जिले में किसान बेहद परेशान है। पहले गेहूं, फिर खाद-बीज और अब मूंग, प्याज तथा केले की खरीदी को लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन सरकार और प्रशासनिक अधिकारी इस समय अपने ‘कंफर्ट जोन’ में बैठे हैं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा या वो ध्यान नहीं देना चाहते कि किसान क्यों त्रस्त है। अगर इन क्षेत्रीय समस्याओं का तुरंत समाधान नहीं हुआ, तो आने वाले समय में इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

कांग्रेस का वार: किसान विरोधी सरकार के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है!

पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता पीसी शर्मा ने इस मुद्दे को लपकते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि होशंगाबाद और हरदा समेत कई प्रमुख जिलों में सरकार मूंग की समय पर खरीदी नहीं कर रही है। जब बंपर पैदावार हुई है, तो 100% खरीदी क्यों नहीं की जा रही? किसानों को औने-पौने दाम पर बाजार में फसल बेचनी पड़ रही है। खरीफ हो या रबी, इस सरकार में किसान हर मोर्चे पर घाटे में है। पहले भी किसानों के गुस्से ने सरकारें पलटी थीं, इस बार भी इतिहास दोहराएगा। यह सरकार के लिए खतरे की घंटी है।

बीजेपी का पलटवार: आंदोलन तो लोकतांत्रिक संवाद और सुधार का जरिया है!

चौतरफा हमलों के बीच बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ. हितेश वाजपेयी ने आंकड़ों को एक अलग ही नजरिए से पेश करते हुए विपक्ष पर तंज कसा है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में साढ़े सात करोड़ की जनता है और अब लगभग 60 जिले होने जा रहे हैं। ऐसी व्यापक परिस्थितियों में अगर साल भर में हर महीने मात्र 25 आंदोलन हो रहे हैं, तो यह हमारे लिए खुशी की बात है कि यह संख्या दो दर्जन से ऊपर नहीं जा रही। हर आंदोलन सरकार के खिलाफ नहीं होता, कुछ आलोचनात्मक होते हैं जिनसे हमें सही दिशा मिलती है। मूंग और प्याज के आंदोलनों से ही हमारी ‘भावांतर योजना’ का जन्म हुआ था। किसानों के कारण ही हम 0% ब्याज और आपदा नियमों में संशोधन कर पाए हैं। यह लोकतांत्रिक संवाद का एक तरीका है।

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