नंद नगरी, दिल्ली में 2 फरवरी 2018 की रात तीन परिवारों के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। एक भीषण सड़क हादसे में एक ही बाइक पर सवार रवि कुमार, सतीश कुमार और रोहित की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद मृतकों के परिजनों ने न्याय और मुआवजे की उम्मीद में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) का दरवाजा खटखटाया। लेकिन करीब 8 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जो फैसला आया, उसने परिवारों को गहरा झटका दिया।

करीब 8 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने मुआवजे से जुड़ी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। बताया गया है कि यह फैसला दिल्ली पुलिस की लापरवाही और कथित ‘फर्जी’ जांच के चलते प्रभावित हुआ। जांच में हुई गंभीर खामियों ने न सिर्फ पूरे मामले की दिशा बदल दी, बल्कि न्याय की प्रक्रिया को भी गुमराह कर दिया। इस लापरवाही का खामियाजा उन परिवारों को भुगतना पड़ा, जो पिछले 8 वर्षों से अपने प्रियजनों की मौत के बाद न्याय और मुआवजे की उम्मीद लगाए बैठे थे।

जांच में बड़ा उलटफेर

नंद नगरी, दिल्ली में हुए इस मामले में न्यायाधिकरण ने पाया कि पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट और डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (DAR) विरोधाभासों से भरी हुई थी। जांच में सामने आया कि शुरुआत में चश्मदीदों और पुलिस रिकॉर्ड में जिस ट्रक का नंबर HR-55G-7002 बताया गया, वही हादसे का जिम्मेदार माना गया था। लेकिन जैसे ही यह तथ्य सामने आया कि उस ट्रक का बीमा नहीं था, गवाहों के बयान अचानक बदल गए और नया ट्रक नंबर HR-69A-0881 सामने आने लगा जिसका बीमा वैध था।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि दोनों ट्रकों का मालिक एक ही व्यक्ति था। इस परिस्थिति को देखते हुए न्यायाधिकरण ने पूरे मामले को ‘प्लांटेड’ यानी फर्जी मानते हुए कहा कि यह साबित ही नहीं हो सका कि दुर्घटना वास्तव में दूसरे ट्रक से हुई थी। अदालत ने जांच अधिकारी की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की। न तो गवाहों की लोकेशन की जांच की गई और न ही मौके से जुड़े प्राथमिक सबूतों को ठीक से जब्त किया गया। इन गंभीर खामियों के चलते पूरा केस कमजोर हो गया और अंततः मुआवजे की सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

 ‘केस ही खत्म कर दिया’

मृतक रवि कुमार के भाई ललित ने बताया कि 8 साल तक लगातार अदालतों के चक्कर लगाने के बाद उनका परिवार पूरी तरह टूट चुका है। उन्होंने कहा कि रवि अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहता था और उसकी मौत के बाद परिवार की आर्थिक और भावनात्मक स्थिति बेहद खराब हो गई है। ललित का आरोप है कि न्याय मिलने में देरी और दिल्ली पुलिस की कथित लापरवाही के कारण उनका हक छिन गया। उनका कहना है कि अगर शुरुआत में सही जांच होती, तो शायद आज फैसला अलग होता।

अनुकंपा पर नौकरी

मृतक सतीश कुमार की कहानी सबसे ज्यादा दिल को झकझोर देने वाली है। पिता के निधन के बाद उन्हें अनुकंपा के आधार पर तिहाड़ जेल में एलडीसी (लोअर डिवीजन क्लर्क) की नौकरी मिली थी। वह अपनी पांच बहनों और बीमार मां का इकलौता सहारा था। हादसे के बाद परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट गई चार बहनें आज भी अविवाहित हैं और घर की स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है। वहीं, तीसरे मृतक रोहित की स्थिति भी कम दर्दनाक नहीं थी। हादसे से महज एक महीने पहले ही उसने अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद वह अपने भाइयों के साथ रह रहा था और परिवार को संभालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इस हादसे ने उसकी जिंदगी भी छीन ली।

पुलिस की कार्यप्रणाली को ‘पक्षपातपूर्ण’ बताया

मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने नंद नगरी सड़क हादसे की जांच को ‘पक्षपातपूर्ण’ करार देते हुए दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। नंद नगरी, दिल्ली में हुए इस मामले में न्यायाधिकरण ने संबंधित जिला पुलिस उपायुक्त (DCP) को निर्देश दिया है कि दोषी जांच अधिकारी के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

साथ ही, कोर्ट ने आदेश दिया है कि मामले की एक प्रति दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भी भेजी जाए, ताकि पूरे मामले की समीक्षा हो सके और भविष्य में जांच प्रक्रिया में इस तरह की धांधली को रोका जा सके। अदालत के इस सख्त रुख के बावजूद, सबसे दुखद पहलू यह है कि 8 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भी पीड़ित परिवारों को न तो न्याय मिला और न ही मुआवजा वे आज भी खाली हाथ हैं।

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