हर वर्ष लाखों विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं में केवल प्रश्न हल करने नहीं बैठते, वे अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों, परिवार की उम्मीदों और भविष्य की संभावनाओं को दांव पर लगाकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचते हैं। किसी के लिए यह डॉक्टर बनने का सपना होता है, किसी के लिए परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने का अवसर, तो किसी के लिए सामाजिक पहचान हासिल करने की उम्मीद। लेकिन जब वही परीक्षाएं बार-बार विवादों, पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के कारण सवालों के घेरे में आने लगें, तब सबसे बड़ा संकट केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि उस भरोसे का होता है जिस पर पूरा युवा वर्ग अपना भविष्य टिकाए बैठा है।
आज केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द करने और 21 जून को पुनर्परीक्षा कराने की घोषणा की। साथ ही अगले वर्ष से परीक्षा को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित प्रणाली में कराने की बात भी कही गई। तर्क दिया गया कि इससे प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं को रोका जा सकेगा और परीक्षा अधिक सुरक्षित हो जाएगी। पहली नजर में यह निर्णय व्यवस्था सुधारने की दिशा में बड़ा कदम लगता है, लेकिन इसके साथ कई ऐसे सवाल भी सामने खड़े हो गए हैं, जिनसे अब बचा नहीं जा सकता।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल परीक्षा का माध्यम बदल देने से पूरी व्यवस्था भरोसेमंद हो जाएगी? क्योंकि यह पहला मौका नहीं है जब राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए की कार्यप्रणाली सवालों में आई हो। पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर बड़ी परीक्षा किसी न किसी विवाद में घिरी है। कभी पेपर लीक, कभी ग्रेस मार्क्स, कभी परिणामों पर सवाल, कभी तकनीकी गड़बड़ियां और कभी परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था। स्थिति यहां तक पहुंची कि 2024 में नीट विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा। लाखों विद्यार्थी दोबारा परीक्षा की मांग करते रहे, लेकिन काउंसलिंग प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि वे विरोध करें, तैयारी करें या अपने भविष्य का अगला फैसला लें।
2025 में भी हालात बहुत अलग नहीं रहे। कहीं प्रश्नपत्र देर से पहुंचे, कहीं परीक्षा विलंब से शुरू हुई, कहीं तकनीकी समस्याएं सामने आईं। हर बार कहा गया कि समस्या सीमित थी, लेकिन जिन छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ, उनके लिए वह समस्या कभी सीमित नहीं रही। सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर संदेह पैदा हो चुका था, तो समाधान केवल कुछ परीक्षा केंद्रों तक ही क्यों सीमित रहा?
अब 2026 में फिर परीक्षा रद्द होने की नौबत आना यह बताता है कि समस्या केवल किसी एक वर्ष की चूक नहीं है। यह उस व्यवस्था की लगातार कमजोर होती विश्वसनीयता का संकेत है, जिस पर देश के करोड़ों युवा भरोसा करके बैठते हैं।
इसी बीच सरकार ने समाधान के रूप में कंप्यूटर आधारित परीक्षा की घोषणा की है। लेकिन यहां भी सवाल कम नहीं हैं। क्योंकि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पहले से ही संयुक्त प्रवेश परीक्षा और राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा जैसी कई परीक्षाएं ऑनलाइन माध्यम में आयोजित करती रही है। इन परीक्षाओं में भी सर्वर ठप होने, तकनीकी गड़बड़ियों, अलग-अलग पालियों में प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर को लेकर विवाद और परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में विद्यार्थी और अभिभावक पूछ रहे हैं कि यदि पहले से ऑनलाइन हो रही परीक्षाएं पूरी तरह विवादमुक्त नहीं हैं, तो क्या नीट में यह नया प्रयोग वास्तव में सफल होगा?
बच्चों और अभिभावकों के मन में कई सवाल लगातार घूम रहे हैं। यदि परीक्षा के दौरान कंप्यूटर खराब हो जाए तो जिम्मेदारी कौन लेगा? यदि इंटरनेट बाधित हो जाए तो छात्र का नुकसान कौन भरेगा? क्या ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को महानगरों जैसी तकनीकी सुविधा मिल पाएगी? क्या अलग-अलग पालियों में परीक्षा होने पर प्रश्नपत्रों का स्तर पूरी तरह समान रखा जा सकेगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या हर बार नई व्यवस्था का प्रयोग बच्चों के भविष्य पर ही किया जाएगा?
दरअसल, समस्या केवल तकनीक की नहीं है। समस्या भरोसे की है। क्योंकि हर बार जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तब सबसे बड़ी कीमत छात्र चुकाता है। वही फिर तैयारी करता है, वही दोबारा परीक्षा देता है, वही मानसिक दबाव झेलता है और वही भविष्य को लेकर असमंजस में जीता है। अभिभावक फिर आर्थिक बोझ उठाते हैं। लेकिन जिन संस्थाओं और अधिकारियों की जिम्मेदारी परीक्षा को निष्पक्ष और सुरक्षित बनाना थी, उनकी जवाबदेही शायद ही कभी तय होती दिखाई देती है।
एनटीए यह कह सकता है कि पुनर्परीक्षा बिना अतिरिक्त शुल्क आयोजित की जाएगी, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस पूरी प्रक्रिया का खर्च आखिरकार जनता के पैसे से ही आता है। यानी परीक्षा तंत्र की विफलताओं का बोझ आर्थिक रूप से भी देश के नागरिक ही उठाते हैं।
यह पूरा मामला भारत की परीक्षा व्यवस्था के अत्यधिक केंद्रीकरण की ओर भी संकेत करता है। करोड़ों छात्रों का भविष्य कुछ घंटों की परीक्षा और एक एजेंसी पर निर्भर हो गया है। ऐसे में यदि वही एजेंसी बार-बार विवादों में घिरती है, तो केवल तात्कालिक सुधारों और नई घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। अब गंभीर संस्थागत सुधारों की जरूरत है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर मूल्यांकन तक पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र निगरानी, बाहरी लेखा परीक्षण और स्पष्ट जवाबदेही तय करनी होगी।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यहां का युवा केवल आंकड़ा नहीं, देश की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि वही युवा लगातार अव्यवस्था, अनिश्चितता और परीक्षा तंत्र की विफलताओं से जूझता रहेगा, तो इसका असर केवल करियर तक सीमित नहीं रहेगा। यह धीरे-धीरे उस भरोसे को भी कमजोर करेगा, जिस पर किसी भी योग्यता आधारित व्यवस्था की नींव खड़ी होती है।
प्रतियोगी परीक्षाएं किसी भी देश की विश्वसनीयता का आईना होती हैं। यदि उसी आईने पर बार-बार सवाल उठने लगें, तो केवल विद्यार्थियों से धैर्य रखने की अपेक्षा पर्याप्त नहीं है। अब आवश्यकता इस बात की है कि व्यवस्था स्वयं यह साबित करे कि मेहनत का मूल्य किसी पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक विफलता से छोटा नहीं है।
आकांक्षा तिवारी “वर्षा”, स्वतंत्र पत्रकार, रायपुर, छत्तीसगढ़।

