वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को प्राप्त क्षमादान की शक्ति एक स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार है। यदि राज्यपाल एक बार किसी कैदी की दया याचिका खारिज कर देते हैं, तो जेल नियमों में उस पर दोबारा विचार करने का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने कहा है, न्यायपालिका कार्यकारी निर्णय में तब तक दखल नहीं दे सकती जब तक कि वह पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण न हो। इस टिप्पणी के साथ चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कुदुदंड बिलासपुर निवासी हत्या के दोषी नीरज माली उर्फ गोलू की याचिका को खारिज कर दिया है।

हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी ने लगाई थी दया याचिका
दरअसल, याचिकाकर्ता नीरज माली को बिलासपुर के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 18 अप्रैल 2001 को हत्या (धारा 302, 148 आईपीसी) के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी उसकी सजा बरकरार रहने के बाद यह फैसला अंतिम हो गया था। कैदी ने वर्ष 2016 में राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर कर सजा माफी की गुहार लगाई थी। जेल अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) ने उसके अच्छे आचरण को देखते हुए समय पूर्व रिहाई की सकारात्मक सिफारिश भी की थी।
राज्यपाल ने खारिज की दया याचिका, पत्नी ने की थी पुनर्विचार की मांगा
24 मार्च 2023 को सक्षम प्राधिकारी (राज्यपाल) ने उसकी दया याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद जुलाई 2023 में कैदी की पत्नी ने पारिवारिक और मानवीय आधारों का हवाला देते हुए इस फैसले पर दोबारा विचार करने का आवेदन दिया, जिसे गृह (जेल) विभाग ने 9 जुलाई 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ‘छत्तीसगढ़ जेल नियमावली, 1968’ के नियम 775 में पुनर्विचार का कोई प्रावधान नहीं है। इसके खिलाफ कैदी ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
कोर्ट में कैदी की ओर से दी गई दलील
कैदी के अधिवक्ताओं का तर्क था कि राज्यपाल की क्षमादान शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 433-ए (जिसमें 14 वर्ष की वास्तविक जेल काटना अनिवार्य है) के बंधनों से मुक्त है। कैदी लगभग 10 वर्ष से अधिक की सजा काट चुका था और जेल नियमों के अनुसार वह नई याचिका का हकदार था। साथ ही उसकी बहन और पिता की मृत्यु के बाद परिवार की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए मानवीय आधार पर विचार होना चाहिए।
कोर्ट ने क्या कहा?
मामले में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सरकारी रिकॉर्ड और नोटशीट का अवलोकन करने के बाद पाया कि विभाग ने केवल 14 साल की अवधि न होने के कारण याचिका खारिज नहीं की थी, बल्कि अपराध की गंभीरता और क्रूरता को भी ध्यान में रखा गया था। कोर्ट ने कहा, कैदी की पत्नी द्वारा दिया गया आवेदन एक नई दया याचिका नहीं, बल्कि पुराने खारिज फैसले पर पुनर्विचार की मांग थी।
हाईकोर्ट ने याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया, लेकिन कैदी को एक कानूनी रास्ता देते हुए यह स्पष्ट किया कि इस आदेश का यह मतलब नहीं है कि याचिकाकर्ता भविष्य के रास्ते बंद हो गए हैं। कैदी कानून के दायरे में रहकर आगे उचित समय पर ‘नई दया याचिका’ या समय पूर्व रिहाई का आवेदन दे सकता है, जिस पर प्राधिकारी बिना इस फैसले से प्रभावित हुए स्वतंत्र रूप से विचार करेंगे।

