पंचकूला के पिंजौर क्षेत्र में वर्ष 2006 में अधिग्रहित की गई भूमि पर दो दशक बीत जाने के बाद भी कोई सरकारी परियोजना शुरू नहीं हो सकी है। भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने सरकारी रिकॉर्ड गायब करने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री से भूमि वापस लौटाने और जांच की मांग की है।
पंचकूला। जिले में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए अधिकारी करीब दो दशक पहले अधिग्रहित की गई अपनी जमीन के मालिकाना हक के लिए प्रशासनिक विभागों के चक्कर काटने को विवश हैं। साल 2006 में प्रशासन ने पिंजौर क्षेत्र के नग्गल सोढ़ियां, हिमशिखा, इस्लामनगर और चिक्कन सहित करीब 13 गांवों की भूमि का अधिग्रहण किया था। इस प्रक्रिया में कई पूर्व सैनिकों की जमीनें भी अधिग्रहित कर ली गई थीं। पीड़ितों का कहना है कि जिस योजना के नाम पर 20 वर्ष पूर्व उनकी संपत्ति ली गई थी, वहां आज तक कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ।
पूर्व सैनिकों के मुताबिक, जब इस क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू हुई थी, उस दौरान वे देश की सीमाओं पर तैनात थे। इस वजह से वे समय पर अपने मामलों की पैरवी नहीं कर सके। वहीं दूसरी ओर, जिन लोगों ने अपनी जमीन पर थोड़ा-बहुत निर्माण कर रखा था, उनकी संपत्ति को अधिग्रहण की सूची से बाहर कर दिया गया।
रिकॉर्ड गायब करने का आरोप
इस मामले के मुख्य शिकायतकर्ता मेंशन-इन-डिस्पैचेस और विशिष्ट सेवा पदक (वीएसएम) से सम्मानित सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल (डॉक्टर) अश्वनी कुमार हैं। उनका आरोप है कि उनके पैतृक प्लॉट संख्या 3, 4 और 5 से संबंधित सरकारी दस्तावेजों को या तो गायब कर दिया गया है या उनमें हेरफेर की गई है।
अश्वनी कुमार और उनके दो पूर्व सैनिक भाई पिछले कई वर्षों से न्याय की आस में अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रहे हैं। तीन दशक से अधिक समय तक राष्ट्र सेवा करने वाले इन पूर्व सैनिकों का कहना है कि प्रशासनिक अनदेखी के कारण अब वे शांतिपूर्ण भूख हड़ताल पर बैठने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
प्रोजेक्ट न बनने पर जमीन वापसी की मांग
पीड़ित पूर्व सैनिकों ने बताया कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली राशि से घर बनाने की योजना बनाई थी। हालांकि, 20 वर्ष गुजर जाने के बाद भी न तो वहां कोई प्रोजेक्ट शुरू हुआ और न ही क्षेत्र का विकास किया गया।
हाल ही में 70 से 80 वर्ष की उम्र के लगभग 20 सेवानिवृत्त सैनिकों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने मांग की है कि नियमों के अनुसार यदि अधिग्रहित जमीन का उपयोग तय कार्य के लिए न हो, तो उसे मूल मालिकों को वापस किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने मूल रिकॉर्ड सुरक्षित करने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग उठाई है।
मुआवजे की राशि पर उठाए सवाल
पूर्व सैनिकों ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण की ओर से हाल में आयोजित ई-नीलामी का हवाला देकर मुआवजे की दर पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि प्राधिकरण ने हाल ही में उसी क्षेत्र की भूमि की ई-नीलामी में दरें करीब 60 हजार रुपये प्रति वर्ग गज तक पहुंचाई हैं।
जबकि अधिग्रहण के समय उन्हें केवल 1331 रुपये प्रति वर्ग गज का मुआवजा ही दिया गया था। पूर्व सैनिकों का कहना है कि यह विशाल अंतर मामले की निष्पक्ष एवं पारदर्शी समीक्षा की आवश्यकता को साबित करता है।


