वीरेंद्र कुमार/नालंदा। राजगीर के झुनुकिया बाबा मंदिर के समीप हुई मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) की घटना ने पूरे बिहार को झकझोर कर रख दिया है। इस मामले में मारे गए पिंटू पासवान और श्रवण पासवान को न्याय दिलाने तथा नगरनौसा डिग्री कॉलेज विवाद में पुलिस की एकतरफा कार्रवाई के विरोध में मंगलवार को बिहारशरीफ में ‘दलित-अति पिछड़ा न्याय मार्च’ का आयोजन किया गया। इस विरोध प्रदर्शन में जनसैलाब उमड़ पड़ा, जहां हर तरफ इंसाफ की मांग गूंजती रही।

​न्याय मार्च: श्रम कल्याण केंद्र से समाहरणालय तक का आक्रोश

बिहारशरीफ के श्रम कल्याण केंद्र मैदान से शुरू हुआ यह विशाल मार्च शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए जिला समाहरणालय पहुंचा। प्रदर्शनकारियों में प्रशासन के प्रति गहरा रोष था। लोगों ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए जमकर नारेबाजी की और दोषियों पर अविलंब कार्रवाई की मांग की। समाहरणालय पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों ने जिला पदाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा।

​पप्पू यादव की हुंकार: 15 हत्यारों को बचा रही है सरकार

इस न्याय मार्च में पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव विशेष रूप से शामिल हुए। उन्होंने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में दलितों और अति पिछड़ों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। पप्पू यादव ने गंभीर आरोप लगाया कि राजगीर मॉब लिंचिंग मामले में शामिल 15 हत्यारों को बचाने के लिए सरकार और पुलिस तंत्र पूरा जोर लगा रहा है।

​सरकार को अल्टीमेटम और भविष्य की रणनीति

सांसद ने सरकार के समक्ष स्पष्ट मांगें रखीं:

  • ​मुआवजा: राजगीर मॉब लिंचिंग के पीड़ित परिवारों को तत्काल 50-50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
  • ​स्पीडी ट्रायल: मामले की सुनवाई स्पीडी ट्रायल के माध्यम से हो ताकि हत्यारों को जल्द से जल्द फांसी की सजा मिल सके।
  • ​नगरनौसा मामला: पुलिस की संदिग्ध भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।

​पप्पू यादव ने प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी कि यदि इन मांगों पर त्वरित कार्रवाई नहीं हुई, तो वे मानवाधिकार आयोग, राज्यपाल और न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि न्याय नहीं मिला, तो वे पूरे बिहार में चक्का जाम करने और ‘बिहार बंद’ का आह्वान करने के लिए मजबूर होंगे।
​यह मार्च न केवल नालंदा, बल्कि पूरे बिहार के दलित-अति पिछड़ा वर्ग के लिए एक बड़ी लामबंदी के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के लिए यह स्थिति आने वाले दिनों में और कठिन हो सकती है।