प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाल किले की प्राचीर से दिमागी नक्सलवाद वाली टिप्पणी ने नए विमर्श को जन्म दिया है, हालांकि यह महज एक सुरक्षा संबंधी टिप्पणी नहीं थी। उसमें भविष्य की एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस का संकेत भी था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है, लेकिन अब दिमागी नक्सल को पहचानकर अलग-थलग करने की जरूरत है। इस टिप्पणी ने स्वाभाविक रूप से सवाल खड़ा किया है कि जब जंगलों में बंदूक उठाने वाला माओवादी कमजोर हो रहा है तो प्रधानमंत्री जिस दिमागी नक्सल की बात कर रहे हैं, उनका संकेत आखिर किस ओर है।

छत्तीसगढ़ और खासकर बस्तर को इस बहस से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बस्तर ने दशकों तक माओवादी हिंसा का दंश झेला है। जंगलों में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच संघर्ष, बारूदी सुरंगें, ग्रामीणों की हत्याएं, स्कूलों और सड़कों का प्रभावित होना और प्रशासन की सीमित पहुंच ने बस्तर को देश के सबसे कठिन आंतरिक सुरक्षा क्षेत्रों में बदल दिया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदली है।

माओवादी संगठन को सुरक्षा बलों के लगातार अभियान से बड़ा नुकसान हुआ है। उसके शीर्ष नेतृत्व को झटका लगा है, बड़ी संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है और कई गिरफ्तार हुए हैं। स्पष्ट है कि इलाके में सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत हुई है और माओवादी संगठन की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचा है। लेकिन इसे क्या केवल जवानों की बंदूक की जीत कहना अधूरा होगा? सुरक्षा अभियान के साथ खुफिया तंत्र, स्थानीय प्रशासन, आत्मसमर्पण नीति, पुनर्वास और विकास की बढ़ती पहुंच ने भी इसमें भूमिका निभाई है।

माओवादी कैडरों के आत्मसमर्पण को भी एक ही नजरिये से देखना ठीक नहीं होगा। यह कहना कि सभी ने विचारधारा छोड़कर स्वेच्छा से हथियार डाले, शायद वास्तविकता को सरल बना देना होगा। सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कारण रहा है। सुरक्षित ठिकाने कम हुए, संगठन के शीर्ष नेतृत्व को नुकसान हुआ, रसद और हथियारों की आपूर्ति कठिन हुई और कई कैडरों के सामने विकल्प सीमित होते गए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी संभव है कि लंबे समय तक हिंसा के बाद संगठन के भीतर मोहभंग पैदा हुआ हो। किसी ने सुरक्षा के दबाव में हथियार छोड़ा होगा, किसी ने परिवार के लिए, किसी ने बेहतर जीवन की उम्मीद में और किसी ने संगठन के रास्ते से निराश होकर। इसलिए हर आत्मसमर्पण की कहानी को एक ही राजनीतिक अर्थ देना उचित नहीं होगा।

यहीं से प्रधानमंत्री की दिमागी नक्सल वाली टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी सशस्त्र आंदोलन को केवल हथियार नहीं चलाते। उसके पीछे विचार, प्रचार, भर्ती, धन, संगठनात्मक नेटवर्क और किसी न किसी रूप में वैचारिक समर्थन भी होता है। इसलिए यदि हथियारबंद माओवादी आंदोलन कमजोर हो गया है तो सरकार की चिंता यह हो सकती है कि उसकी वैचारिक जमीन या उसका नेटवर्क भविष्य में फिर से सक्रिय न हो जाए। प्रधानमंत्री का संकेत संभवतः इसी व्यापक चुनौती की ओर है। यानी जंगल में बंदूक लेकर खड़ा व्यक्ति ही पूरी समस्या नहीं है, बल्कि वह विचार और नेटवर्क भी चुनौती हो सकता है जो किसी हिंसक आंदोलन को दोबारा खड़ा करने की क्षमता रखता हो।

इस नजरिये से देखें तो दिमागी नक्सल की बहस को पूरी तरह निरर्थक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। किसी भी लोकतांत्रिक राज्य को यह चिंता करने का अधिकार है कि कोई प्रतिबंधित और हिंसक संगठन फिर से अपने लिए समर्थन, पैसा, प्रचार या नए कैडर जुटाने में सफल न हो। यदि कोई व्यक्ति या नेटवर्क माओवादी हिंसा के लिए सक्रिय रूप से धन जुटाता है, भर्ती में मदद करता है, संगठनात्मक गतिविधियों में सहयोग करता है या हिंसा को संगठित तरीके से बढ़ावा देता है तो राज्य को उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई करनी ही चाहिए।

इसी बिंदु पर एक बेहद महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सीमा भी सामने आती है। दिमागी नक्सल कोई कानूनी श्रेणी नहीं है। किसी व्यक्ति को केवल इसलिए नक्सली नहीं कहा जा सकता कि वह सरकार की आलोचना करता है। किसी पत्रकार ने सुरक्षा अभियान पर सवाल उठाया तो वह नक्सली नहीं हो जाता। किसी सामाजिक कार्यकर्ता ने आदिवासियों के अधिकारों की बात की तो वह नक्सली नहीं हो जाता। किसी नागरिक ने विस्थापन का विरोध किया तो वह माओवादी नहीं हो जाता। किसी विश्वविद्यालय के छात्र ने सरकार की नीति से असहमति जताई तो वह भी नक्सली नहीं हो जाता। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है और सरकार की आलोचना लोकतंत्र विरोधी गतिविधि नहीं है।

प्रधानमंत्री के संकेत को यदि गंभीर नीति में बदलना है तो सबसे पहले दिमागी नक्सल की स्पष्ट सीमा तय करनी होगी। केवल विचार, लेख, भाषण या सरकार-विरोधी राय को इसका आधार नहीं बनाया जा सकता। कार्रवाई का आधार व्यक्ति का वास्तविक आचरण, हिंसक संगठन से संबंध और उसके खिलाफ उपलब्ध ठोस प्रमाण होने चाहिए। यही वह फर्क है जो लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विद्रोह को अलग करता है।

दरअसल प्रधानमंत्री के बयान का राजनीतिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। भाजपा और संघ परिवार लंबे समय से वामपंथी उग्रवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि एक वैचारिक चुनौती के रूप में देखते रहे हैं। इस दृष्टि से प्रधानमंत्री का संदेश यह हो सकता है कि हथियारबंद माओवादी आंदोलन के सैन्य ढांचे को कमजोर करने के बाद अब उसके वैचारिक प्रभाव और उन नेटवर्कों को भी चुनौती दी जानी चाहिए जो उसके लिए जमीन तैयार कर सकते हैं। लेकिन इस दृष्टिकोण की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि सरकार माओवादी हिंसा और लोकतांत्रिक वामपंथ के बीच कितना स्पष्ट अंतर रखती है।

मार्क्सवादी विचार से असहमति एक राजनीतिक मत है। वामपंथी राजनीति से राजनीतिक संघर्ष लोकतंत्र का हिस्सा है। किसी सरकारी नीति का विरोध भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सशस्त्र माओवादी हिंसा का समर्थन करना या किसी प्रतिबंधित हिंसक संगठन की गतिविधियों में मदद करना बिल्कुल अलग विषय है। इन दोनों को एक ही श्रेणी में रखना लोकतांत्रिक बहस को नुकसान पहुंचाएगा।

बस्तर की मौजूदा स्थिति इसीलिए एक बड़े अवसर का संकेत भी देती है। यदि सुरक्षा बलों ने माओवादी संगठन को पीछे धकेल दिया है तो अब उस खाली जगह को लोकतंत्र और विकास को भरना होगा। केवल सड़क बना देना पर्याप्त नहीं होगा। स्कूल में शिक्षक भी पहुंचना होगा। अस्पताल में डॉक्टर और दवा भी पहुंचनी होगी। युवाओं के लिए रोजगार और कौशल के अवसर भी पैदा करने होंगे। वनवासी समाज को अपनी जमीन, जंगल, संस्कृति और भविष्य से जुड़े फैसलों में सम्मानजनक भागीदारी भी मिलनी होगी।

आत्मसमर्पण करने वालों का पुनर्वास केवल कागज पर नहीं बल्कि जमीन पर होना चाहिए। क्योंकि माओवादी विचारधारा की सबसे स्थायी हार केवल तब नहीं होगी जब उसके लड़ाके मारे जाएं या हथियार डाल दें। उसकी असली हार तब होगी जब उस क्षेत्र का युवा यह महसूस करे कि उसके भविष्य का रास्ता बंदूक नहीं बल्कि शिक्षा, रोजगार, लोकतंत्र और संविधान है। यदि राज्य यह भरोसा पैदा करने में सफल होता है तो किसी भी हिंसक विचारधारा के लिए सामाजिक जमीन लगातार सिकुड़ती जाएगी।

बस्तर के लिए यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सुरक्षा की सफलता को लोकतंत्र की सफलता में बदलने का अवसर है। जवान जंगल में सुरक्षा दे सकते हैं, प्रशासन विकास पहुंचा सकता है और सरकार योजनाएं बना सकती है, लेकिन अंततः स्थायी शांति नागरिक के भरोसे से आती है। प्रधानमंत्री के दिमागी नक्सल वाले बयान को न तो पूरी तरह राजनीतिक जुमला मानकर खारिज करना उचित होगा और न ही इसे हर सरकार-विरोधी आवाज पर लागू किया जा सकता है। इसके पीछे एक वास्तविक सुरक्षा प्रश्न है कि क्या हथियारबंद संगठन के कमजोर होने के बाद भी उसकी वैचारिक और संगठनात्मक जमीन बची हुई है। लेकिन उस चुनौती का जवाब संविधान की सीमा में ही दिया जा सकता है। किसी विद्रोह की अंतिम हार उसके लड़ाकों के मारे जाने या हथियार डालने से नहीं होती। उसकी अंतिम हार तब होती है जब ऐसी विचार भी खत्म हो जाए।

(लेखक पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

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