दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) को डीरजिस्टर करने और अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया व दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि यह याचिका पूरी तरह गलतफहमी पर आधारित और बिना किसी मेरिट के है. कोर्ट ने कहा कि याचिका बेबुनियाद है, ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं, अवमानना अलग कानून के तहत आती है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दायर याचिका कानूनी व्यवस्था को सही ढंग से समझे बिना दाखिल की गई है. जिसमें भारत के चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 29A(5) के कथित उल्लंघन के लिए आम आदमी पार्टी (AAP) का पंजीकरण रद्द कर दे।
दिल्ली हाई कोर्ट मे अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से डिस्क्वालिफ़ाई करने और आप पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेन्द्र उपाध्याय की बेंच ने सुनवाई की. कोर्ट ने इस जनहित याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा याचिका में लगाए गए आरोप में कोई कानूनी दम नहीं है. लिहाजा इस याचिका पर कोई आदेश जारी करने का कोई औचित्य नहीं बनता है.
याचिका में आरोप लगाया गया था कि शराब नीति मामले की सुनवाई के दौरान नेताओं ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार किया और सोशल मीडिया पर जज के खिलाफ अभियान चलाया। इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाए और AAP का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाए। हालांकि, अदालत ने साफ कहा कि ऐसी मांगों का कोई कानूनी आधार नहीं बनता और PIL सुनवाई योग्य नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि आप चाहते हैं कि हम चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का आदेश दें? लेकिन क्या कानून में राजनीतिक पार्टी को डि-रजिस्टर करने का कोई प्रावधान है. अगर है तो उसका पूरा कानूनी ढांचा क्या है?
याचिका में कहा गया है कि यह याचिका जनहित में दायर की गई है, ताकि न्याय वितरण प्रणाली में जनता का विश्वास” बना रहे और राजनीतिक पद या दर्जे की परवाह किए बिना न्यायिक कार्यवाही के प्रति समान सम्मान सुनिश्चित किया जा सके।
कोर्ट ने कहा कि किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण तभी रद्द किया जा सकता है, जब उसे UAPA या इसी तरह के किसी कानून के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित किया गया हो.
वकील ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A(5) कहती है कि जब कोई पार्टी रजिस्टर होती है, तो उसे लिखित रूप से यह वचन देना होता है कि वह संविधान और उसके मूल सिद्धांतों का पालन करेगी. वकील ने तर्क दिया कि अगर कोई पार्टी इन शर्तों का उल्लंघन करती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई या डि-रजिस्ट्रेशन की मांग उठ सकती है.
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