वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को हत्या व साक्ष्य छिपाने के संदेहियों की नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ एग्जामिनेशन, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट, या किसी दूसरी ऐसी ही साइंटिफिक जांच तकनीक से गुजरने के लिए मजबूर नहीं करने का निर्देश दिया। इसके साथ कोर्ट ने याचिका को निराकृत कर दिया। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने यह निर्णय पारित किया।

क्या है मामला
दरअसल, रायगढ़ की चक्रधरनगर पुलिस ने एक हत्या व साक्ष्य नष्ट करने के अपराध में अज्ञात आरोपियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) व 238 (A) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर जांच शुरू किया है। पुलिस ने संदेह पर लक्ष्मीनारायण पटेल कृषक निवासी ग्राम बेहरापाली व अर्धना भगत गृहिणी निवासी ग्राम महापल्ली को पूछताछ के लिए बुलाया व जांच की जा रही है।

पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ लगाई याचिका
कार्रवाई के खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में कहा गया कि पिटीशनर्स का नाम न तो FIR में है और न ही उनके खिलाफ कोई सबूत मौजूद है। यह 16.06.2026 की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट से साफ है। इसके बावजूद, पिटीशनर्स को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत कोई कानूनी नोटिस जारी किए बिना, लगभग 18 दिनों तक लगातार पुलिस स्टेशन बुलाया गया, लंबे समय तक हिरासत में रखा गया, सुपर्दनामा पर साइन करने के लिए मजबूर किया गया और बिना कोई सीज़र मेमो या एक्नॉलेजमेंट तैयार किए उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए।
सहमति के बिना टेस्ट के लिए बुलाने का आरोप
इसके बाद 20.06.2026 को पुलिस ने पिटीशनर्स को उनकी सहमति के बिना, बिना किसी न्यायिक मंज़ूरी के और ऐसी दखल देने वाली तकनीकों को कंट्रोल करने वाले तय कानूनी सुरक्षा उपायों का पूरी तरह उल्लंघन करते हुए, ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ़ और नार्को-एनालिसिस टेस्ट के लिए 22 और 23 जून 2026 को रायपुर में पेश होने के लिए मजबूर किया।
हाईकोर्ट ने दिए निर्देश
मामले में कोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच एजेंसी पिटीशनर्स को नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ एग्जामिनेशन, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट, या किसी दूसरी ऐसी ही साइंटिफिक जांच तकनीक से गुजरने के लिए मजबूर नहीं करेगी। अगर ऐसे टेस्ट का प्रस्ताव है, तो वे सिर्फ पिटीशनर की मर्जी से, जानकारी के साथ और साफ सहमति से ही किए जा सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि यह सेल्वी (सुप्रा) केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए कानून, उसमें बताए गए सुरक्षा उपायों, जिसमें NHRC गाइडलाइन्स और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के लागू नियम शामिल हैं, उसके अनुसार ही होगा। पिटीशनर की सहमति सक्षम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने यह पक्का करने के बाद दर्ज की जाएगी।

