Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

शाही सवारी

राजभवन का नाम बदलकर जब लोकभवन किया गया, तब बड़े जोर-शोर से यह कहा गया था कि यह कदम औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की दिशा में है। लोकभवन यानी जनता का घर, लेकिन जरा इस लोक भवन की ओर एक बार झांक आइए। यह बात समझते देर नहीं लगेगी कि नेम प्लेट पर सिर्फ ‘लोक’ लिख देने से ‘राज’ का तरीका नहीं बदल जाता है। व्यवहार में यह जस का तस बना रहता है। सिर्फ शब्दों की सजावट भर से हकीकत पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है। सच तो यह है कि नाम का यह बदलाव एक सस्ती ब्रांडिंग से ज्यादा और कुछ नहीं ! अब जरा मुद्दे पर आइए। चर्चा है कि जिस इमारत को जनता का घर बताया जा रहा है, वहां रहने वाले महामहिम की शाही सवारी के लिए जनता के टैक्स के पैसे से दो लग्जरी गाड़ियां खरीदी गई हैं। एक टोयोटा वेलफायर और दूसरी बीएमडब्ल्यू। वेलफायर लोकभवन में रहेगी और बीएमडब्ल्यू दिल्ली में महामहिम का रुतबा बढ़ाएगी। जब महामहिम दिल्ली में होंगे तो बीएमडब्ल्यू में चलेंगे और जब वे वहां नहीं होंगे, तब उस गाड़ी का लोकतांत्रिक उपयोग कौन करेगा? इसे भी लेकर चर्चाएं हैं। खैर, यह बात बहुत दिनों तक छिपी नहीं रह सकती है। बहरहाल एक दिलचस्प विरोधाभास देखिए। इधर सूबे के ठेठ आदिवासी मुख्यमंत्री फॉर्च्यूनर छोड़कर देसी स्कॉर्पियो पर आ रहे हैं और उधर लोकभवन में ‘लोक’ के नाम पर ‘लग्जरी’ का स्तर लगातार ऊंचा हो रहा है। यह हाल तब है जब सूबे की सरकार की कमाई घट रही है। खर्चों का बोझ कंधों पर भारी पड़ रहा है। विकास योजनाओं में कटाई-छटाई की नौबत आ रही है। मगर लगता है कि हमारे महामहिम इन चिंताओं से मुक्त हैं। दरअसल वह अब भी महामहिम ही हैं। अब तक माननीय नहीं हुए हैं। प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने महामहिम शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी। तब भी यह कहा गया था कि यह शब्द औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक लगता है। मालूम नहीं कि इस तरह के जतन से आखिर बदलता क्या है?  

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एक वाक्या यह भी

सरकार में चाहे कोई भी पद कितना ही रुतबेदार क्यों न हो? सहूलियतों की अपनी सीमाएं हैं। न जाने किन-किन नियमों को शिथिल कर महामहिम के लिए लग्जरी गाड़ियां खरीदी गई है। खैर, इस वाक्या से एक किस्सा याद आ गया। पूर्व उप मुख्यमंत्री टी एस सिंहदेव जब नेता प्रतिपक्ष थे, तब उन्हें सरकारी गाड़ी दी जानी थी। अब टी एस सिंहदेव ठहरे ऊंचे कद काठी वाले नेता। सो उन्होंने उन्हें मिलने वाली सरकारी गाड़ी की खरीदी में अपनी फरमाइश बता दी। उन्हें दो टूक जवाब दिया गया कि जो फरमाइश उन्होंने की है, वह दी गई वित्तीय स्वीकृति के बहुत ऊपर है। तब उन्होंने यह पेशकश रखी कि अंतर की राशि वह खुद दे देंगे। मगर मसला यह था कि सरकारी खरीदी में व्यक्तिगत राशि लिए जाने का कोई नियम ही नहीं था। आखिरकार सरकार ने नियमों को शिथिल कर टी एस सिंहदेव की फरमाइश वाली गाड़ी खरीदने की अनुमति दे दी थी। यह बात और है कि तब खरीदी गई गाड़ी करोड़-डेढ़ करोड़ की नहीं थी। मामला तब सिर्फ नियमों में फंस रहा था, लग्जरी में नहीं। 

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फिटनेस डायरी

सूबे के एक महकमे में इन दिनों खेल भावना कुछ ज्यादा ही व्यक्तिगत हो चली है। सचिव महोदय ने अचानक बैडमिंटन को अपना लिया है। वजह चाहे फिटनेस हो, फुर्सत हो या फिर परिस्थितियों का कोई नया ड्रॉप शॉट। खेल के प्रति उनका समर्पण काबिले-तारीफ है। गोल-मटोल काया, हाथ में रैकेट और चेहरे पर ओलंपिक जीत लेने के भाव भरी उनकी तस्वीरें वाकई प्रेरक लग रही थीं। सचिव महोदय हर रोज बैडमिंटन खेलते, जमकर पसीना बहाते और फिर उसी ताजगी के साथ एक तस्वीर खिंचवाते। खेल के प्रति उनका जुनून फोटो में कैद हो रहा था। लोग उनकी तस्वीरों को फिटनेस डायरी समझ रहे थे, मगर जब उनकी तस्वीरें विभाग की एक महिला अधिकारी के मोबाइल पर नियमित रूप से लैंड करने लग लगीं तब जाकर समझ आया कि मामला स्पोर्ट्स अपडेट से थोड़ा आगे निकल गया है। शुरुआत में महिला अधिकारी ने इसे महज उत्साह समझकर नजरअंदाज किया। आखिर बॉस हैं। बैडमिंटन खेल रहे हैं। खुश हैं। इसलिए तस्वीर भेज दी होगी। इसमें क्या? लेकिन धीरे-धीरे तस्वीरों के साथ आने वाले शब्दों ने खेल का स्कोर बदलना शुरू कर दिया। मैसेज में लिखी गई कुछ अनचाही पंक्तियां अब बैडमिंटन के शटल की बजाए सवाल बनकर नेट के इस पार से उस पार जाने लगीं थी। फिर एक दिन यह पूरा मैच घर तक पहुंच गया। महिला अधिकारी ने अपने पति को पूरा किस्सा सुना दिया। सुनते हैं कि महिला अधिकारी ने उच्च स्तर पर शिकायत करने का मन बना लिया है। अब जहां शिकायत होगी, वहां बैडमिंटन के नियमों की जगह सरकारी नियम-कायदे खेलेंगे।फिलहाल सचिव महोदय का बैडमिंटन जारी है…

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ध्यान बोनस 

सरकारी कर्मचारियों को साल भर में पहले से ही 254 छुट्टियां नसीब है। 18 सार्वजनिक छुट्टियां, 28 सामान्य छुट्टियां, 61 ऐच्छिक, 104 शनिवार-रविवार और 13 विशेष। अब इसमें  ध्यान बोनस भी जोड़ लीजिए। सरकार ने अधिकारी-कर्मचारियों को विपश्यना शिविर के लिए 12 दिन की छुट्टी देने का फैसला किया है। कुल मिलाकर कैलेंडर अब ऐसा हो गया है, जिसमें काम को ढूंढना वैसा होगा जैसे ध्यान में सांस को पकड़ना। सांस आती-जाती दिखती है, और फिर गायब हो जाती है। सरकार का तर्क स्पष्ट है- तनाव कम होगा तो काम बेहतर होगा। बात सौ फीसदी सही है, लेकिन एक मासूम-सा सवाल यह है कि इतनी छुट्टियों के बीच तनाव पैदा होने का समय आखिर मिलता कब है? या फिर यह मान लिया गया है कि सरकारी कर्मचारी काम से नहीं, छुट्टियों के मैनेजमेंट से ही तनाव में आ जाता है। सरकार की नई व्यवस्था से अब स्थिति कुछ यूं है कि काम की थकान से राहत के लिए छुट्टी चाहिए और छुट्टी की थकान से राहत के लिए ध्यान चाहिए। सरकार आपको ध्यान के लिए समय और वेतन दोनों देगी लेकिन विपश्यना शिविर तक पहुंचने का किराया-भाड़ा आपको खुद उठाना होगा।

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शुद्ध कचरा

सूबे के आबकारी महकमे को लगता है कि शायद यह पर्यावरण हितैषी फैसला है कि शराब कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक की बोतलों में बेची जाए। कांच अपेक्षाकृत कम कचरा पैदा करता है। टिकाऊ है। रिसाइकल भी हो जाता है। मगर शायद टिकाऊ चीजें विकास के मॉडल में फिट नहीं बैठती। आंकड़े खुद बोलते हैं। राज्य में शराब की सालाना खपत 1.5 करोड़ केस है। हर केस में औसतन 12 बोतलें। यानी हर साल कुल 18 करोड़ प्लास्टिक बोतलें। एक प्लास्टिक बोतल का औसत वजन 35 ग्राम मान लें तो इससे हर साल 6300 टन शुद्ध प्लास्टिक कचरा पैदा होगा। यानी रोजाना औसतन 4.93 लाख प्लास्टिक बोतल (18 करोड़ ÷ 365)। हर मिनट में 342 बोतल। एक बोतल का एक बार इस्तेमाल, फिर सीधे कचरे की कतार में। सरकार की तरफ से तो सिंगल-यूज प्लास्टिक कम करने की बड़ी-बड़ी प्रतिबद्धताएं हैं, लेकिन यहां 18 करोड़ सिंगल-यूज प्लास्टिक बोतल सालाना कचरे में बदलेंगी। पर्यावरण का हाल क्या होगा? आसानी से समझ आ जाता है- लैंडफिल साइट भरेंगी। नदियां-तालाब प्लास्टिक से पट जाएंगे। पशु-पक्षी इन बोतलों को निगलेंगे। ग्रामीण-शहरी इलाकों में खुले में जलाए जाने पर डायोक्सिन जैसा घातक जहर हवा में घुलेगा। माइक्रोप्लास्टिक खाद्य श्रृंखला और पेयजल में घुसकर सार्वजनिक स्वास्थ्य को चुपचाप नुकसान पहुंचाएगा। शहरी निकायों और पंचायतों के पास पहले से ही कचरा प्रबंधन के सीमित संसाधन हैं। अब उनके कंधों पर 6300 टन अतिरिक्त प्लास्टिक कचरा का बोझ भी लाद दिया जाएगा। जरा सोचिए अगर हर साल 18 करोड़ प्लास्टिक बोतल और 6300 टन कचरा हमारी व्यवस्था में शामिल होता रहेगा, तब गली-मोहल्लों, नदियों-नालों, उद्यानों, गांवों और खेतों की तस्वीर कैसी होगी? बहरहाल यह बात और है कि प्लास्टिक की बोतल में शराब बेचने की शुरुआत 1 अप्रैल से होनी थी, मगर डिस्टलरी संचालकों ने अब तक प्लास्टिक बोतल बनाने की यूनिट ही नहीं लगाई है। शायद यह सोचकर कि कहीं फैसला बदल न जाए। इसका असर यह हुआ कि शराब की सप्लाई प्रभावित हो रही है। सप्लाई गिरेगी, तो शराब से होने वाली सरकार की कमाई घट जाएगी। इस नई तस्वीर ने आबकारी महकमे की चिंता बढ़ा दी है। शायद इसलिए आनन-फानन में कांच की बोतल में ही शराब बेचने का दबाव विभाग पर है, लेकिन यह तात्कालिक व्यवस्था है। विभाग का मन नहीं बदल गया है। शराब तो प्लास्टिक बोतल में ही बिकेगी, फिलहाल यह तय है। 

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पोस्टिंग

कई राज्यों में 2020 बैच के आईपीएस अफसर एसपी बन गए हैं, मगर सूबे में लेटलतीफी हो गई। एसपी बनने का सपना देख रहे इन अफसरों में से ज्यादातर हाल ही में बने रायपुर कमिश्नरेट में डीसीपी बना दिए गए थे। अब खबर आई है कि जल्द ही इस बैच के अफसरों को एसपी के रूप में मैदानी तैनाती दी जाएगी। आईपीएस के प्रस्तावित तबादला सूची में नई जिम्मेदारी दे दी जाएगी। इस बैच से रॉबिंसन गुरिया इकलौते चेहरे रहे हैं, जिन्हें सबसे पहले एसपी बनने का मौका मिल गया था। एसपी नहीं बनने से बैच में काफी बेचैनी भी थी। 2020 बैच में आठ आईपीएस अफसर हैं, जिनमें उमेश गुप्ता, विकास कुमार, पूजा कुमार, चिराग जैन, मयंक गुर्जर, संदीप पटेल, स्मृतिक राजनाला और राबिंसन गुरिया शामिल हैं। राबिंसन और विकास कुमार को छोड़ दिया जाए, तो अब देखिए बचे हुए अफसरों में से किस-किस का नंबर लगता है। विकास कुमार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। राज्य सरकार से उन्हें एनओसी मिल गई है। यह भी अजीब इत्तेफाक है कि एसपी बनने की उम्र में वह केंद्रीय सेवा का रुख कर रहे हैं। देश भर में 2020 बैच के वह इकलौते आईपीएस अधिकारी हैं, जो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर काम करते दिखेंगे।