राकेश चतुर्वेदी की कलम से
कैबिनेट मंत्री खामोश
सभा में हों या संगठन में, बैठक में हों या समीक्षा में मुंह खोल दें तो मंत्रीजी की तूती बोलती है. यही मंत्रीजी कैबिनेट की बैठकों में अब खामोश रहने लगे हैं. मंत्रीजी की इस खामोशी का राज बैठक के बीच एक मंत्रीजी ने ही पूछ लिया. जवाब आया खामोश रहने में ही भलाई है. बैठक के बाद चलते हुए एक्सप्लेन किया कि आज कल कैबिनेट बैठक के बीच हुई चर्चा की हर बात तो बाहर आ रही है. दूसरा नहीं तो तीसरा, तीसरा नहीं तो चौथा, बातें लीक कर ही देता है. ऐसी-वैसी किसी बात का ठीकरा फिर अपने माथे न फूट जाए, इसलिए मौन धारण कर खमोश बैठे रहना ही उचित है. इधर, बड़ी बात ये है कि साथी मंत्री के साथ हुए इस गोपनीय बातचीत का किस्सा भी लीक हो गया है.
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व्हाइट टॉपिंग में एक्शन, खाली निकले नोटिस
गारंटी पीरिएड की 140 करोड़ वाली व्हाइट टॉपिंग वाली सड़कों का मामला उछला तो विभागीय एक्शन दिखाते हुए ताबड़तोड़ 9 जिला अफसरों को नोटिए थमाए गए. सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई और जवाब के लिए 15 दिन का समय दिया गया. अब नोटिस और जवाब आने के दिन तो पहले ही पूरे हो गए हैं लेकिन एक्शन के नाम पर कार्रवाई शून्य ही रही है. शुरुआत में माना जा रहा था कि ठेकेदारों को लंबा लाभ पहंुचाने का जानबूझकर प्रयास करने वाले ये अफसरों का अब नपना तय हैं, लेकिन विभाग में ही चर्चा चलने लगी है कि ये कार्रवाई भी सड़कों की लंबाई नापने के लिए लंबी यात्रा पर निकल गई है. कार्रवाई से बचने का तोड़ खुद अफसरों ने निकाला है या फिर ठेकेदारों से निकलवाया गया है, इसका जवाब नोटिस जारी करने वाले अफसरों की फाइल में ही कैद है.
जाति का तोड़ निकालने के लिए महामंथन
इन दिनों सत्ताधारी पार्टी में जाति वर्ग से आने वाले कुछ जनप्रतिनिधि समाज के दम पर जमकर उछल-कूद कर रहे हैं. जाति का प्रतिनिधित्व सिर पर ऐसे चढ़कर बोल रहा है कि मुंह में जो आए वो बोल दो, जब मनमर्जी हो गाइडलाइन तोड़ दो. मामला गरमाने के बाद ऐसे नेता लगातार तलब जरूर किए जा रहे हैं, लेकिन कुछ दिन बाद ही नसीहत कोई काम आती नहीं दिखती. पार्टी में अब ऐसे नेताओं का तोड़ निकालने के लिए महामंथन चल रहा है. महामंथन में सबसे अधिक जोर विकल्प तलाशने पर दिया जा रहा है. विकल्प मिलने पर आने वाले समय में कुछ चेहरे ऐसे नेताओं के समकक्ष खड़े करने की प्लानिंग भी देखने को मिल सकती है.
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चतुर्थ श्रेणी वाले सबसे बड़े खबरदार
मध्य प्रदेश के प्रमुख कार्यालयों में इन दिनों चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की खूब पूछपरख हो रही है. कारण सिर्फ एक ही है कि साहब लोगों की मिनट टू मिनट लोकेशन दे देना. हफ्तों तक चक्कर लगाने के बाद भी साहब लोगों से मुलाकात नहीं कर पाने वाले प्रमुख लोगों को ये कर्मचारी ऐसा समय और लोकेशन देते हैं कि जहां मिनटों में मुलाकात हो जाती है. इन ही नहीं बड़े लेागों के छोटे-मोटे सिफारिशी काम चुपके से निपटवा देते हैं. निर्माण से जुड़े एक प्रमुख कार्यालय में तो गजब ही हो रहा है, जहां बड़े-बड़े लोग एक ऐसे ही कर्मचारी को सर कहकर संबोधित करते नजर आते हैं.
नेता-पटवारियों के चक्कर में जबरन पिस गए मंत्री-कलेक्टर
मध्य प्रदेश के एक प्रमुख शहर में जिले से जिले में पटवारियों की तबादला सूची जारी हुई, फिर लगे हाथ आधे से अधिक पटवारियों की वापसी भी हो गई. संशोधित सूची जारी होने के बाद मामला गरमाया तो सीधी आंच कलेक्टर-प्रभारी मंत्री के ऊपर ही आई. तहकीकात में पता चला कि संशोधित सूची के पीछे असल हाथ लोकल नेताओं का रहा. नेताओं का मन रखने के लिए मंत्री ने सहमति दे दी और प्रक्रिया में कलेक्टर को भी शामिल होना पड़ा. अब संशोधन का आवेदन और सिफारिश करने वाले तो पूरे मामले से बाहर हैं और मंत्री-कलेक्टर को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

