राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल (Swati Maliwal) ने संसद के उच्च सदन में ई-सिगरेट (e-cigarettes) और वेपिंग के बढ़ते चलन को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि रंग-बिरंगी डिजाइन और विभिन्न फ्लेवर में उपलब्ध छोटी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बच्चों और युवाओं को आकर्षित कर रही हैं, जिसके कारण वे कम उम्र में ही निकोटिन के संपर्क में आ रहे हैं। राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए मालीवाल ने कहा कि ई-सिगरेट और वेपिंग डिवाइस को आधुनिक और सुरक्षित विकल्प के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन वास्तव में ये युवाओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि आकर्षक पैकेजिंग और फ्लेवर की वजह से बड़ी संख्या में किशोर और छात्र इन उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

उन्होंने सरकार का ध्यान इस ओर दिलाते हुए कहा कि देश में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध होने के बावजूद इसकी अवैध बिक्री और ऑनलाइन उपलब्धता की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी को और मजबूत किए जाने की जरूरत है। स्वाति मालीवाल ने कहा कि ई-सिगरेट और वेपिंग की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई मामलों में माता-पिता को बच्चों के इसका इस्तेमाल करने की जानकारी तक नहीं हो पाती। उन्होंने कहा कि सामान्य सिगरेट की तरह इसमें न तो धुआं दिखाई देता है और न ही तेज गंध आती है, जिसके कारण बच्चे और किशोर आसानी से इसे छिपाकर इस्तेमाल कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि आकर्षक डिजाइन, छोटे आकार और अलग-अलग फ्लेवर वाली डिवाइस युवाओं को तेजी से अपनी ओर खींच रही हैं। यही वजह है कि यह समस्या केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक चिंता का विषय भी बनती जा रही है।

आखिर Vape क्या होता है?

Vape या ई-सिगरेट एक बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होती है। यह एक विशेष तरल पदार्थ को गर्म करके एरोसोल (Aerosol) तैयार करती है, जिसे उपयोगकर्ता सांस के जरिए अपने फेफड़ों तक पहुंचाता है। इस तरल पदार्थ को आमतौर पर ई-लिक्विड (E-liquid) या वेप लिक्विड कहा जाता है। ई-लिक्विड में निकोटिन, विभिन्न प्रकार के फ्लेवर और अन्य रासायनिक तत्व मौजूद हो सकते हैं। यही वजह है कि इसे सामान्य सिगरेट का सुरक्षित विकल्प मानना गलत हो सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, ई-सिगरेट से निकलने वाले उत्सर्जन को केवल “पानी की भाप” समझना सही नहीं है। वहीं अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) भी स्पष्ट करता है कि ई-सिगरेट हानिरहित वाटर वेपर नहीं, बल्कि एरोसोल बनाती है, जिसमें निकोटिन के अलावा कई अन्य संभावित रूप से हानिकारक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं। स्वाति मालीवाल ने कहा कि देश में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध के बावजूद इसकी अवैध बिक्री की शिकायतें सामने आती रहती हैं। उन्होंने सरकार से ऐसे उत्पादों की सप्लाई चेन और बिक्री नेटवर्क पर सख्त निगरानी रखने की मांग की, ताकि बच्चों और युवाओं तक इनकी पहुंच रोकी जा सके।

स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता जरूरी

मालीवाल ने कहा कि केवल कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं होगी। इसके साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता अभियान चलाकर छात्रों और अभिभावकों को निकोटिन की लत तथा वेपिंग के संभावित स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जानकारी देना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में वेपिंग और निकोटिन की लत युवाओं के बीच एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।

बच्चों को फ्लेवर के जरिए आकर्षित करने की चिंता

स्वाति मालीवाल ने अपने बयान में मिंट, कैंडी और मैंगो जैसे फ्लेवर का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे फ्लेवर बच्चों और किशोरों को आकर्षित करते हैं, जिससे वे कम उम्र में ही वेपिंग की ओर बढ़ सकते हैं।WHO ने भी ई-सिगरेट में इस्तेमाल होने वाले आकर्षक फ्लेवर्स और युवाओं को लुभाने वाली डिजाइन को लेकर चिंता जताई है। वहीं CDC के अनुसार, बाजार में उपलब्ध कई ई-सिगरेट उत्पादों में ऐसे फ्लेवर होते हैं, जो विशेष रूप से युवाओं को आकर्षित कर सकते हैं।

कितना खतरनाक है Vape ?

विशेषज्ञों का मानना है कि ई-सिगरेट को पूरी तरह सुरक्षित विकल्प मानना सही नहीं है। WHO के मुताबिक ई-सिगरेट से निकलने वाले एरोसोल में निकोटिन के साथ कई अन्य संभावित रूप से जहरीले पदार्थ भी हो सकते हैं।  इनमें से कुछ पदार्थ कैंसर के जोखिम से जुड़े माने जाते हैं, जबकि कुछ हृदय और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों की संभावना बढ़ा सकते हैं। निकोटिन स्वयं एक अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है, जो विशेष रूप से किशोरों और युवाओं के मस्तिष्क विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

बच्चों और किशोरों के लिए ज्यादा चिंता क्यों?

इसका सबसे बड़ा कारण निकोटिन की लत और दिमाग का विकास है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बच्चों और किशोरों में निकोटिन का सेवन मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकता है। किशोरावस्था के दौरान दिमाग का विकास लगभग 20 वर्ष की उम्र के मध्य तक जारी रहता है, इसलिए इस अवधि में निकोटिन का संपर्क अधिक चिंता का विषय माना जाता है। स्वाति मालीवाल ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि निकोटिन बच्चों के विकसित हो रहे दिमाग को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। उनके अनुसार, कम उम्र में निकोटिन के संपर्क में आने वाले बच्चों में जीवनभर इसके आदी बने रहने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को निकोटिन की लत से बचाने के लिए केवल कानूनी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि व्यापक जागरूकता और शिक्षा भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में विशेष जागरूकता अभियान चलाने की मांग की।

क्या भारत में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध है?

भारत में ई-सिगरेट पर वर्ष 2019 से कानूनी प्रतिबंध लागू है। केंद्र सरकार ने प्रोहिबिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स एक्ट (PECA), 2019 लागू किया था। इस कानून के तहत ई-सिगरेट के उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण, भंडारण और विज्ञापन पर रोक लगाई गई है। राज्यसभा में बोलते हुए स्वाति मालीवाल ने कहा कि सरकार ने 2019 में PECA कानून लाकर ई-सिगरेट को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद आज भी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से इनकी बिक्री जारी है।

उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि राज्यों के साथ समन्वय बनाकर वेप और ई-सिगरेट की अवैध बिक्री पर सख्ती से रोक लगाई जाए। साथ ही स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं तथा अभिभावकों को भी इनके खतरों के बारे में जानकारी दी जाए।मालीवाल ने कहा कि बच्चों और युवाओं के बीच बढ़ती वेपिंग को केवल स्वास्थ्य के नजरिए से नहीं, बल्कि अवैध बिक्री और प्रतिबंधित उत्पादों की उपलब्धता के मुद्दे के रूप में भी गंभीरता से देखने की जरूरत है।

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