अभय मिश्रा, मऊगंज। कानून की रक्षा करने वाली खाकी जब खुद कटघरे में खड़ी हो जाए, तो सवाल सीधे सिस्टम पर उठते हैं। मध्य प्रदेश के नवगठित जिले मऊगंज से एक ऐसी ही सनसनीखेज खबर आ रही है, जिसने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली को हिलाकर रख दिया है। आरोप किसी आम मुलाजिम पर नहीं, बल्कि एक कार्यवाहक एएसआई (ASI) पर हैं, जिन पर ‘एंट्री’ के नाम पर अवैध वसूली का बड़ा सिंडिकेट चलाने का आरोप लगा है। हद तो देखिए, जिस मऊगंज जिले में अब तक यातायात थाने का कोड तक अलॉट नहीं हुआ, वहां ये साहब खुद को ‘यातायात प्रभारी’ बताकर धड़ल्ले से चालान काट रहे हैं! आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है वसूली का यह पूरा खेल?
मऊगंज निवासी अनुपेंद्र कुमार पाण्डेय ने आईजी रीवा जोन को एक लिखित शिकायती पत्र भेजा है। इस शिकायत ने मऊगंज पुलिस की साख पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। शिकायत में सीधे तौर पर कार्यवाहक एएसआई नरेश प्रताप सिंह को कटघरे में खड़ा किया गया है। दावा है कि बीती 7 मई 2026 की रात लगभग पौने दस बजे, मऊगंज बायपास स्थित बाबा ढाबा के पास एक गाड़ी खड़ी थी, तभी कार्यवाहक एएसआई अपने सरकारी वाहन में एक आरक्षक और सबसे हैरान करने वाली बात—एक ‘निजी यानी प्राइवेट’ ड्राइवर के साथ वहां पहुंचे।
रौब दिखाते हुए गाड़ी की तस्वीरें खींची
शिकायत के मुताबिक, वाहन चालक से पूछताछ के दौरान सीधे तौर पर कहा गया कि तुम्हारी “तहसीली एंट्री” जमा नहीं हुई है। जब चालक ने इस कथित अवैध एंट्री को देने से साफ इनकार कर दिया, तो रौब दिखाते हुए गाड़ी की तस्वीरें खींची गईं। और कुछ ही देर बाद, उस वाहन मालिक के मोबाइल पर पूरे 5 हजार रुपये का ऑनलाइन चालान ठोक दिया गया। यानी एंट्री नहीं दी, तो सीधे कार्रवाई का हंटर चला दिया गया।
अवैध वसूली का खेल
आरोप सिर्फ एक गाड़ी तक सीमित नहीं हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि मऊगंज और हनुमना क्षेत्र में भारी वाहनों से नियमित रूप से अवैध वसूली का यह खेल खेला जा रहा है। आलम यह है कि जो गाड़ियां कथित तौर पर ‘मासिक एंट्री’ दे रही हैं, वो ओवरलोड होने के बावजूद पुलिस की नाक के नीचे से बिना रोक-टोक गुजर रही हैं। लेकिन जिसने ‘एंट्री’ देने से मना किया, उस पर नियमों का कानून तुरंत लागू हो जाता है।
खाकी का ध्यान इन जानलेवा ट्रकों पर नहीं
विडंबना देखिए, पुलिस अधीक्षक कार्यालय के ठीक सामने कई ओवरलोड हाइवा वाहन बेखौफ खड़े रहते हैं, लेकिन मजाल है कि उन पर कोई चालानी कार्रवाई की जाए। इसी मऊगंज में पिछले एक महीने के भीतर इन ओवरलोड वाहनों की चपेट में आने से दो मासूम जान जा चुकी हैं। लेकिन खाकी का ध्यान इन जानलेवा ट्रकों पर नहीं, बल्कि शहर के बाहर ग्रामीण इलाकों की मोटरसाइकिल और ऑटो चालकों के चालान काटने पर ज्यादा केंद्रित रहता है।
कार्यवाहक एएसआई खुद को ‘यातायात प्रभारी बता रहे
शिकायत पत्र में यह भी बड़ा खुलासा किया गया है कि कार्यवाहक एएसआई खुद को ‘यातायात प्रभारी’ बताकर ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में जाकर गाड़ियां रोकते हैं। जबकि वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, उन्हें केवल कस्बे की यातायात व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। सवाल उठता है कि आखिर शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को छोड़कर साहब सुदूर ग्रामीण इलाकों और कस्बों में चेकिंग अभियान क्यों चला रहे हैं? क्या इसके पीछे का मकसद कुछ और है?
सवाल और भी हैं। नरेश प्रताप सिंह का मूल पद कथित तौर पर ‘प्रधान आरक्षक’ का है, जिन्हें चालानी कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार ही नहीं है। इतना ही नहीं, उन्होंने सरकारी वाहन के लिए मिले शासकीय चालक को दरकिनार कर, एक निजी यानी प्राइवेट ड्राइवर को पनाह दे रखी है। अब सवाल यह है कि इस प्राइवेट ड्राइवर को सैलरी या मानदेय कहां से दिया जा रहा है?
इसके पहले हनुमना थाने में पदस्थ आरक्षक मनीष पांडे और शोभित सिंह पर भी ऐसे ही गंभीर आरोप लगे थे, तब तत्कालीन एसपी दिलीप सोनी ने शोभित सिंह को लाइन अटैच किया था, लेकिन उनके जाते ही रसूख के दम पर इन्हें फिर मलाईदार पोस्टिंग मिल गई।
इन सभी गंभीर आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और मामला अब रीवा जोन के पुलिस महानिरीक्षक (IG) के पाले में है। लेकिन ये सवाल बेहद जायज हैं कि जब मऊगंज जिले में आज तक यातायात थाना का कोड ही अलॉट नहीं हुआ, तो आखिर किस नियम के तहत और किस कोड से ये चालानी कार्रवाई की जा रही है? अगर आरोप सच हैं, तो यह सीधे-सीधे जनता की जेब पर डाका और कानून का मखौल है। अब देखना यह है कि आईजी रीवा इस कथित वसूली तंत्र पर क्या एक्शन लेते हैं, या फिर मऊगंज में खाकी का यह ‘एंट्री खेल’ यूं ही जारी रहेगा।


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