Rajasthan Nikay Chunav 2026: राजस्थान में 9 और 11 सितंबर को 309 नगरीय निकायों के चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव के बाद नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं में नई सरकारें बनेंगी। भाजपा, कांग्रेस समेत राजनीतिक दल और प्रत्याशी मतदाताओं के सामने विकास और बेहतर सुविधाओं का एजेंडा रख रहे हैं। लेकिन छठे राज्य वित्त आयोग के आंकड़े बताते हैं कि शहरी निकायों की अपनी वित्तीय क्षमता इन वादों की राह में बड़ी चुनौती है।

वर्ष 2023-24 में राजस्थान के शहरी निकायों की अपनी आय 1,460.35 करोड़ रुपये थी। इसी अवधि में इन निकायों का कुल खर्च 8,022.07 करोड़ रुपये रहा। यानी निकाय अपनी आय से कुल खर्च का सिर्फ 18.2 प्रतिशत ही पूरा कर सके।

हर 100 रुपये के खर्च में अपनी कमाई से सिर्फ 18 रुपये

आंकड़ों को आसान भाषा में समझें तो 2023-24 में नगर निकायों ने हर 100 रुपये खर्च किए, तो उसमें अपनी कमाई से करीब 18 रुपये ही जुटाए। बाकी जरूरतों के लिए उन्हें सरकारी अनुदान और दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ा। हालांकि, इस अंतर को सीधे निकायों का घाटा कहना सही नहीं होगा। इसी वित्त वर्ष में शहरी निकायों को सभी स्रोतों से कुल 7,531.09 करोड़ रुपये की प्राप्तियां हुईं। इसमें निकायों की अपनी आय के साथ सरकारी अनुदान और अन्य प्राप्तियां भी शामिल हैं। इसके बावजूद कुल प्राप्तियां कुल खर्च से 490.98 करोड़ रुपये कम रहीं।

कुल प्राप्तियों में अपनी आय सिर्फ 19.4 फीसदी

राजस्थान के शहरी निकायों की वित्तीय स्थिति का एक और अहम पहलू यह है कि उनकी अपनी आय कुल प्राप्तियों का सिर्फ 19.4 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं की वित्तीय व्यवस्था में सरकारी सहायता और अन्य स्रोतों की बड़ी भूमिका रही। यही वित्तीय तस्वीर अब निकाय चुनाव के बीच अहम हो जाती है। राजनीतिक दल शहरों में सड़क, सफाई, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट, पार्क, यातायात व्यवस्था और कचरा प्रबंधन जैसी सुविधाओं को बेहतर करने के वादे कर रहे हैं।

विकास के वादों के सामने संसाधनों की चुनौती

चुनाव में स्थानीय मुद्दे राजनीतिक दलों के एजेंडे में सबसे ऊपर हैं। कई जगह शहरों के सौंदर्यीकरण और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की बात भी कही जा रही है। लेकिन इन वादों को जमीन पर उतारने के लिए निकायों के पास उपलब्ध संसाधन बड़ा सवाल हैं। आंकड़े बताते हैं कि अपनी कमाई और कुल खर्च के बीच काफी अंतर है। ऐसे में नई शहरी सरकारों के सामने एक तरफ मतदाताओं की उम्मीदें होंगी, तो दूसरी तरफ सीमित वित्तीय क्षमता के बीच विकास कार्यों को पूरा करने की चुनौती होगी।

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