भोजपुर। जवईनिया गांव के गरीब के हक के लिए लड़ने वाले और भोजपुर में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवा भरत तिवारी की कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस मामले में अब राजद नेत्री रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ट्वीट कर सीधे सम्राट सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। रोहिणी आचार्य ने आरोप लगाया है कि हत्या के नामजद आरोपी पुलिस अधिकारी को नई जिम्मेदारी सौंपकर सरकार ने एक तरह से उसे पुरस्कृत किया है।
सत्ता के संरक्षण में फर्जी मुठभेड़ की साजिश
रोहिणी आचार्य ने अपने ट्वीट के जरिए इस बात पर गहरी चिंता जताई कि किस तरह सत्ता शीर्ष और पुलिस के आला अधिकारियों की मिलीभगत से एक युवा की जान ले ली गई। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस पुलिस अधिकारी पर हत्या का नामजद मुकदमा दर्ज है, उसे पदोन्नति या नई जिम्मेदारी देना इस बात का प्रमाण है कि इस फर्जी मुठभेड़ को सरकारी तंत्र का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। उन्होंने इसे लोकतंत्र में न्याय के साथ खिलवाड़ करार दिया।
मोबाइल फोन का सच छिपाने की कोशिश?
रोहिणी ने अपनी पोस्ट में उस अहम सवाल को फिर से दोहराया है जो परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों के गले की फांस बना हुआ है: मृतक का मोबाइल फोन कहां है? करीब दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी मोबाइल फोन का पुलिस द्वारा बरामद न करना और उसे परिजनों को न सौंपना, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उस फोन में ऐसी कोई बड़ी सच्चाई या सबूत दर्ज हैं, जो किसी प्रभावशाली व्यक्ति या बड़े नाम को सीधे तौर पर फंसा सकते हैं।
सरकार और डीजीपी से सीधा सवाल
रोहिणी आचार्य ने बिहार के मुख्यमंत्री, राज्य सरकार और डीजीपी से कुछ तीखे सवाल किए हैं:
- आधा दर्जन से अधिक नामजद आरोपियों में से एक की भी गिरफ्तारी अब तक क्यों नहीं हुई?
- जांच प्रक्रिया इतनी धीमी और रहस्यमयी क्यों है, जिसमें पारदर्शिता का नामो-निशान नहीं है?
- क्या यह ढुलमुल रवैया किसी रसूखदार को बचाने की एक सोची-समझी रणनीति है?
रोहिणी आचार्य का यह ट्वीट न केवल मृतक भरत तिवारी के परिजनों की पीड़ा को बयां करता है, बल्कि बिहार में पुलिसिया कार्यप्रणाली और प्रशासनिक ईमानदारी पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी लगाता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पर क्या सफाई देता है, या फिर यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा।

