बाहरी सुख-सुविधाओं से कई दरज़ बेहतर है आत्म स्वीकृति. “A man cannot be comfortable without his own approval” तात्पर्य, जब तक हम स्वयं से संतुष्ट नहीं होते तब तक सांसारिक उपलब्धियां सच्चा सुख नहीं दे सकती. संसाधनों से प्राप्त सुख अंतरतम तक नही पहुंच पाता. दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए अपना निर्णय बदलने वाले इस बिंदु पर आकर निराश होते हैं. समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप जीवन जीने वाले अक्सर भीतर से एकाकी होते हैं. अपने मन की आवाज को अनदेखा करना एक स्थाई दुःख का बड़ा कारण हो सकता है. जब हम अपने विचारों, मूल्यों और कर्मों के प्रति ईमानदार रहते हुए ही आत्मसंतोष को प्राप्त किया जा सकता है.

आत्मस्वीकृति का अर्थ है अपनी कमियों और खूबियों दोनों को सहर्ष स्वीकार करना. आत्मस्वीकृति इंसान को आत्मविश्वास और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. जब आप स्वयं को स्वीकार कर लेते हैं तब ही सामाजिक आलोचना और जगत निंदा आपको तोड़ नही पाती है और न ही दुनियां की प्रशंसा आपको अहंकारी बनाती है.

मन की शांति के बिना अगर कोई सफलता का दावा कर रहा है तब समझ लीजिए वह निरा झूठ बोल रहा है.क्योंकि किसी भी व्यक्ति के पास सब कुछ हो और खुद से खुश न हों तो सुख के सारे साधन व्यर्थ हो जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि व्यक्ति को अपने सिद्धांतों पर टिक कर अपने निर्णय स्वयं लेंकर अपने अंतर्मन की आवाज़ को महत्व दें.

जो व्यक्ति खुद की नजरों में सही है दरअसल वही सुखी और सफल है. क्योंकि आत्मस्वीकृति ही वह कुंजी है जो हमें सच्चे आराम और संतोष की ओर ले जाती है.

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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