रेणु अग्रवाल, धार। मध्यप्रदेश के धार की ऐतिहासिक भोजशाला में मंगलवार को आयोजित सत्याग्रह में काशी के सुमेर पीठ के शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती पहुंचे। उन्होंने मां वाग्देवी (सरस्वती) की पूजा-अर्चना करने के बाद श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा- इंदौर हाईकोर्ट का फैसला और पुरातत्व (ASI) की रिपोर्ट सनातनियों के संघर्ष और साक्ष्यों की एक बड़ी विजय है। यह स्थान मूल रूप से एक ज्ञानस्थली, साधना स्थली और गुरुकुल था।

गुरुकुल और मूर्ति स्थापना की मांग

मुख्यमंत्री की घोषणा का समर्थन करते हुए उन्होंने मांग की कि भोजशाला को भविष्य का शिक्षा केंद्र बनाने के लिए यहाँ एक गुरुकुल स्थापित किया जाए। साथ ही, लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय से मां सरस्वती की मूल मूर्ति वापस लाई जाए। यदि ऐसा संभव न हो, तो जनसहयोग से यहाँ स्फटिक या ग्रेनाइट की भव्य प्रतिमा स्थापित हो।

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स्वतंत्र बोर्ड और कमेटी बननी चाहिए

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का आह्वान करते हुए उन्होंने मांग की कि देश के करीब पौने 5 लाख (4.75 लाख) मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर सनातनियों का एक स्वतंत्र बोर्ड और कमेटी बननी चाहिए। मंदिरों के धन का उपयोग गुरुकुलों, गौशालाओं और शिक्षा के लिए होना चाहिए, न कि अन्य धार्मिक स्थलों के लिए।

गुलामी के प्रतीकों को मिटाने पर जोर

उन्होंने कहा कि जैसे चीन और जापान ने अपनी आजादी के बाद गुलामी के सभी प्रतीकों को मिटा दिया, वैसे ही भारत में भी राज्य, जिला और शहर स्तर पर सर्वे कर गुलामी के सभी चिह्नों को हमेशा के लिए शिक्षा और समाज से मिटा देना चाहिए।उन्होंने कहा कि वसंत पंचमी मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस है। इस दिन यहां आकर आहुति और पूजन करने से बुद्धि सात्विक और परिष्कृत होती है।

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