दिल्ली की भलस्वा लैंडफिल साइट पर वर्षों से खड़ा कूड़े का विशाल पहाड़ अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। सालों तक इस डंपिंग ग्राउंड में हर दिन सैकड़ों-हजारों टन कचरा डाले जाने के कारण यहां कूड़े का एक बड़ा पहाड़ बन गया था। अब सरकार की ओर से इसे हटाने का काम तेजी से किया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, भलस्वा लैंडफिल साइट से अब तक करीब 1 करोड़ टन से अधिक कचरा हटाया जा चुका है। कचरे के इस पहाड़ को हटाने के लिए लगातार काम चल रहा है और सरकार ने इसे पूरी तरह खत्म करने की समयसीमा भी तय कर दी है। सरकार का लक्ष्य 31 दिसंबर 2026 तक भलस्वा लैंडफिल साइट से कूड़े के पहाड़ को पूरी तरह हटाना है। इसके लिए लैंडफिल साइट से पुराने कचरे को निकालकर उसकी प्रोसेसिंग और निस्तारण किया जा रहा है।
मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली नगर निगम (MCD) पुराने लैंडफिल की खुदाई के लिए बायोमाइनिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। इस प्रक्रिया में वर्षों से जमीन में दबे कचरे को खोदकर बाहर निकाला जाता है और फिर अलग-अलग तरह के कचरे को छांटकर उनका अलग-अलग तरीके से निस्तारण किया जाता है।
कचरे को अलग-अलग कर किया जा रहा निस्तारण
बायोमाइनिंग के दौरान लैंडफिल में जमा पुराने कचरे को मशीनों की मदद से खोदा जाता है। इसके बाद कचरे की छंटाई की जाती है, ताकि अलग-अलग सामग्री को उसकी प्रकृति के अनुसार संबंधित जगहों पर भेजा जा सके। इस प्रक्रिया का मकसद सिर्फ कूड़े के पहाड़ को कम करना नहीं, बल्कि उपयोगी सामग्री को अलग करना और बाकी कचरे का उचित निस्तारण करना भी है। हालांकि, भलस्वा से रोजाना बड़ी मात्रा में कचरा हटाए जाने के बीच यह सवाल अहम है कि कचरे की छंटाई के बाद अलग-अलग श्रेणियों का कचरा किन जगहों पर भेजा जा रहा है और उसका अंतिम निस्तारण कैसे किया जा रहा है। लैंडफिल हटाने की पूरी प्रक्रिया में यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कूड़े का पहाड़ एक जगह से हटाकर दूसरी जगह खड़ा करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। भलस्वा लैंडफिल से कूड़े का पहाड़ हटाने का मतलब सिर्फ ट्रकों में कचरा भरकर उसे किसी दूसरी जगह डंप करना नहीं है। यहां बायोमाइनिंग के जरिए दशकों से दबे कचरे को खोदकर निकाला जा रहा है और मशीनों की मदद से उसे अलग-अलग कैटेगरी में बांटकर निस्तारित किया जा रहा है।
65-75% कचरा इनर्ट वेस्ट
बायोमाइनिंग के दौरान खुदाई करने वाली मशीनें लैंडफिल में दबे पुराने कचरे को बाहर निकालती हैं। इसके बाद मशीनों के जरिए इसकी छंटाई की जाती है। हर दिन प्रोसेस किए जाने वाले कचरे में करीब 65 से 75 फीसदी हिस्सा इनर्ट वेस्ट का होता है। यह मुख्य रूप से छंटाई के बाद बचने वाली मिट्टी जैसी सामग्री होती है। इसके अलावा करीब 8 से 10 फीसदी कचरा कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन वेस्ट होता है। इसमें टूटी हुई कंक्रीट, ईंट और निर्माण या तोड़फोड़ से निकलने वाली दूसरी सामग्री शामिल होती है।
RDF का भी किया जा रहा इस्तेमाल
बचे हुए मटीरियल में रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (RDF) भी शामिल होता है। यह ऐसा कचरा है जिसे प्रोसेस करने के बाद ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उपयोग इंडस्ट्री में पारंपरिक ईंधन के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। इस तरह भलस्वा लैंडफिल से निकलने वाले पूरे कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर डंप करने के बजाय उसकी छंटाई कर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा रहा है। इससे लैंडफिल के पुराने कचरे को कम करने के साथ-साथ अलग-अलग सामग्री के उपयोग और निस्तारण की प्रक्रिया भी संभव हो रही है।
कहां जा रहा भलस्वा का कचरा?
भलस्वा लैंडफिल से कूड़े का पहाड़ हटाने के दौरान निकलने वाले कचरे को दूसरी जगह सिर्फ डंप नहीं किया जा रहा, बल्कि उसकी प्रकृति के हिसाब से अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल और निस्तारण किया जा रहा है। एमसीडी अधिकारियों के मुताबिक, बायोमाइनिंग के दौरान निकलने वाले अलग-अलग मटीरियल को निर्धारित स्थानों पर भेजा जाता है।
नरेला और रोहिणी में गड्ढे भरने में इस्तेमाल
अधिकारियों के अनुसार, सबसे बड़ी मात्रा में निकलने वाला इनर्ट वेस्ट और बेकार मलबा दिल्ली के निचले इलाकों, जैसे नरेला और रोहिणी के कुछ हिस्सों में ले जाया जाता है। इसका इस्तेमाल जमीन में मौजूद गड्ढों और निचले हिस्सों को भरने के लिए किया जाता है। वहीं, रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (RDF) को दिल्ली और आसपास की पेपर मिलों तथा सीमेंट फैक्ट्रियों में भेजा जाता है। वहां इसे औद्योगिक भट्टियों में कोयले के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
कंस्ट्रक्शन वेस्ट का अलग निस्तारण
भलस्वा से निकलने वाले कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन वेस्ट को भी अलग तरीके से हैंडल किया जाता है। इसमें टूटी हुई कंक्रीट, ईंटें और निर्माण व तोड़फोड़ से जुड़ी अन्य सामग्री शामिल होती है। कचरे की छंटाई के बाद इस श्रेणी की सामग्री का निर्धारित प्रक्रिया के तहत निस्तारण किया जाता है।
31 जुलाई तक 99.07 लाख मीट्रिक टन कचरा हटाया
अधिकारियों के मुताबिक, 31 जुलाई तक भलस्वा लैंडफिल से 99.07 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा हटाया जा चुका था। अब लैंडफिल में बचे कूड़े के पहाड़ को भी तेजी से हटाने का काम चल रहा है। अधिकारियों को उम्मीद है कि बचा हुआ कचरे का ढेर 15 अक्टूबर तक हटा दिया जाएगा। इसके बाद पूरी डंपिंग साइट को साफ करने के लिए 31 दिसंबर 2026 की समयसीमा तय की गई है।
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