चुप रहना अक्सर अधिक बोलने से बेहतर साबित हुआ है. “मौनं सर्वार्थ साधनम्” इस प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति का आशय है कि चुप रहने या मौन साधना से व्यक्ति अपने सभी काम और लक्ष्य पूरे कर सकता है. इस सूक्ति मे छिपा हुआ एक संदेश भी है कि बिना वजह बोलने या बहस करने से जहां तक हो सके बचना चाहिए.
“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्.” अर्थात केवल बोलने के लिए बोलना या अपने थोथे ज्ञान का प्रदर्शन करने से बेहतर है विवेकपूर्ण बात किया जाए.
“बचनु कहहिं जनु बाजि बिचारी. सुनत सुखद सबके मन भारी॥”
रामचरितमानस की इस पंक्ति मे कहा गया है, भाव: वाणी ऐसी होनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को सुख दे. समय रहते यह समझ जाइए कि हर बात का जवाब देना आवश्यक नहीं होता. कभी-कभी ख़ामोशी आपसे बेहतर बोलती है, उसे बोलने दीजिए. इसी लिए कहा गया है “Silence is golden.”
मनुष्य को प्रदत्त नैसर्गिक बड़ी शक्तियों में से एक है बोल कर अपनी भावना व्यक्त करना. जो शब्द रिश्ते बना सकते हैं टूटे दिल को जोड़ सकते हैं और किसी के जीवन में उम्मीद जगा सकते हैं वही शब्द कभी विवाद, गलतफहमी और रिश्तों में दरार का कारण भी बन जाते हैं. जीवन में जितना महत्व सही समय पर बोलने का है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सही समय पर चुप रहना होता है. मौन का अर्थ कमजोरी बिल्कुल नहीं होता. कई बार चुप रहना व्यक्ति को अधिक शक्तिशाली बना देता है. खास तौर पर मौन उस व्यक्ति को और भी प्रभावशाली बना देता है जिसे इस बात का शहूर होता है कि किस बात का जवाब देना चाहिए और किस बात को नजरअंदाज करना उचित है.
अमूमन हमारे सामने ऐसी परिस्थितियां आते ही रहतीं हैं जिसमे कोई हमें उकसाता है, आलोचना करता है या बिना सोचे कुछ भी कह देता है. इस परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना बहुत आसान होता है और बहुत से लोग यह गलती करते भी हैं लेकिन ठीक इस समय स्वयं को रोक लेना कठिन भी होता है और बुद्धिमत्तापूर्ण भी. “Silence is sometimes the best answer.” कभी-कभी मौन सबसे प्रभावशाली उत्तर साबित होता है.
स्मरण रहे एक क्षण की चुप्पी हमें ऐसे शब्द बोलने से बचा सकती है जिनका पछतावा वर्षों तक रहे. इसलिए जब भावनाएँ उफान पर हों तब थोड़ा रुक जाना चाहिए. ऐसे समय मेँ दस सेकंड का मौन हमें दस साल के पछतावे से बचा सकता है. वस्तुतः मौन हमे आत्मचिंतन का अवसर देता है. शोर में हम दूसरों की आवाज़ तो सुन पाते हैं लेकिन अपनी अंतरात्मा की आवाज़ दब जाती है . मौन हमें स्वयं से मिलने का मौका देता है. इसलिए अपने विचारों को समझने के लिए , अपनी गलतियों पर विचार करने और भविष्य की योजना बनाने के लिए हमे शांति की आवश्यकता होती है. मौन, चुप रहने की एक अवस्था नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की अद्भुत प्रक्रिया है.
सोशल मीडिया के इस दौर में सभी अपनी बात तुरंत कह देना चाहते हैं. हर छोटी बड़ी घटना पर टिप्पणी, हर विवाद पर प्रतिक्रिया और हर विषय पर अपनी राय देना आदत बन गई है. समझदारी हर बात पर मुह खोलने मे नहीं, बल्कि यह पहचानने में है कि कहाँ बोलना आवश्यक है और कहाँ चुप रहना ही सबसे अच्छा उत्तर है.
हर परिस्थिति में चुप रहना भी सही नहीं है जहाँ अन्याय हो, वहाँ आवाज़ उठाना चाहिए, जहाँ किसी निर्दोष के अधिकारों का हनन हो रहा हो वहाँ मौन कमजोरी मानी जाएगी. मौन और कायरता मे ज़रा सा फ़र्क होता है जिसे समझना ज़रूरी है.
अनावश्यक वाद-विवाद और बेसिर पैर की बातों में मौन बुद्धिमानी है, लेकिन सत्य और न्याय के प्रश्न पर बोलना नैतिक ज़िम्मेदारी है. जीवन में कुछ लोग हमे हमारे शब्दों से नहीं पहचान पाते, ऐसे लोगों के समक्ष अपने कर्मों को बोलने देना चाहिए. समय के पास सभी के सभी सवालों का जवाब होता है इसलिए शांत रहें एक दिन आपकी सफलता आपकी आलोचनाओं का बेहातरीन जवाब बन जाएगी .

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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