अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ भाजपा की राजनीति लंबे समय तक संगठन की मजबूती, अनुशासन और चुनावी रणनीति की पहचान रही। यही वह संगठन था, जिसने कांग्रेस के मजबूत गढ़ को लगातार तीन बार भेदकर नए चेहरों को विधायक बनवाया। पहले विनोद खांडेकर, फिर रामजी भारती और उसके बाद सरोजनी बंजारे को मौका देकर भाजपा ने यह संदेश दिया था कि डोंगरगढ़ में व्यक्ति नहीं, संगठन चुनाव जिताता है। लेकिन आज वही संगठन अपने ही भीतर चल रही खींचतान, नाराजगी और आरोपों के कारण संकट में दिख रहा है।
संगठन के जानकारों का कहना है कि डोंगरगढ़ भाजपा में असंतोष की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी। मंडल अध्यक्ष अमित जैन लगातार तीन बार इस पद पर रहे। पहले दो कार्यकाल तक कार्यकर्ताओं ने उनके साथ मिलकर संगठन को चलाया, लेकिन तीसरी बार भी वही नाम आने पर कई कार्यकर्ताओं ने खुलकर नाराजगी जतानी शुरू कर दी।
कार्यकर्ताओं के एक वर्ग का मानना था कि संगठन में बदलाव की जरूरत थी, लेकिन नेतृत्व ने इस संकेत को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद सत्ता परिवर्तन के बाद जसमीत सिंह बन्नोंआना को मंडल अध्यक्ष बनाया गया। यहीं से विवाद और गहरा गया। कार्यकर्ताओं के एक हिस्से ने आरोप लगाया कि संगठन में एकतरफा राजनीति हो रही है और पुराने, जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। इसी नियुक्ति को लेकर परिवारवाद के आरोप भी उठे, क्योंकि जसमीत सिंह बन्नोंआना से पहले उनके बड़े पिता सुरेंदर बन्नोंआना भी डोंगरगढ़ मंडल अध्यक्ष रह चुके थे।
संगठन के भीतर यह सवाल जोर पकड़ने लगा कि क्या जिम्मेदारियां कार्यकर्ता की मेहनत से मिल रही हैं या रिश्तों और करीबी समीकरणों से तय हो रही हैं। हालांकि ये आरोप कार्यकर्ताओं की नाराजगी के रूप में सामने आए, पार्टी ने इन्हें आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया। इसी बीच युवा मोर्चा में आकाश राजपूत की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठे।
कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने यह आरोप लगाया कि वे भाजपा जिला अध्यक्ष कोमल सिंह राजपूत के करीबी रिश्तेदार हैं और इसी वजह से उन्हें जिम्मेदारी दी गई। वहीं संगठन के कई पुराने कार्यकर्ता खुद को लगातार किनारे किए जाने से आहत रहे। बताया जाता है कि कांग्रेस शासनकाल में भाजपा के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे कुछ कार्यकर्ता भी बाद में संगठन से अलग-थलग पड़ गए। इसी क्रम में संगठन के भीतर नाराजगी और बढ़ती चली गई।
डोंगरगढ़ भाजपा में विरोध सिर्फ पदों तक सीमित नहीं रहा। कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना मजबूत होने लगी कि पार्टी के फैसले अब जमीनी कार्यकर्ताओं की राय से नहीं, बल्कि एक छोटे से घेरे के इशारे पर हो रहे हैं। यही वजह रही कि असंतोष धीरे-धीरे खुलकर सामने आ गया। पहले 111 कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफा दिया। यह सिर्फ विरोध का एक कदम नहीं था, बल्कि संगठन के भीतर जमा लंबे तनाव का विस्फोट था। इसके बाद भी हालात नहीं संभले और कई कार्यकर्ताओं ने पार्टी से दूरी बनानी शुरू कर दी।
समस्या जब सोशल मीडिया तक पहुंची तो मामला और बिगड़ गया। कार्यकर्ताओं द्वारा पार्टी और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ लगातार लिखाई-पढ़ाई और पोस्टिंग शुरू हो गई। पार्टी नेतृत्व ने इसे अनुशासनहीनता माना। जिला संगठन ने पहले नोटिस जारी किए, जवाब मांगे और फिर डोंगरगढ़ जाकर कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। पार्टी का प्रयास था कि अंदरूनी नाराजगी बातचीत से सुलझ जाए, लेकिन जब स्थिति सामान्य नहीं हुई तो मामला प्रदेश संगठन तक पहुंचा।
इसके बाद भाजपा ने सख्त कदम उठाते हुए डोंगरगढ़ शहर मंडल कार्यसमिति को भंग कर दिया। साथ ही प्रिंस कक्कड़, अनिल पाण्डेय, वीरेंद्र साहू, संतोष राव और परविंदर सिंह मोंटी को पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया। पार्टी का कहना है कि ये कार्रवाई संगठन में अनुशासन बनाए रखने और गलत संदेश रोकने के लिए जरूरी थी।
भाजपा जिला अध्यक्ष कोमल सिंह राजपूत ने इस पूरे मामले पर कहा कि पिछले कुछ दिनों से कुछ कार्यकर्ता किसी के उकसावे और बहकावे में आकर पार्टी और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पर लगातार लिख रहे थे, जिससे कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति बन रही थी। उन्होंने बताया कि संबंधित लोगों को नोटिस देकर जवाब लिया गया, डोंगरगढ़ में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की गई और संगठन की बात समझाने की कोशिश हुई। इसके बाद जिला कोर कमेटी के साथ विचार कर प्रस्ताव प्रदेश अध्यक्ष को भेजा गया।
प्रदेश नेतृत्व के निर्देश पर पांच लोगों को छह वर्ष के लिए निष्कासित किया गया और डोंगरगढ़ शहर इकाई को भंग कर दिया गया, ताकि संगठन का सकारात्मक संदेश जाए। दिलचस्प यह है कि मंडल भंग होने के बाद इस्तीफा देने वाले कई कार्यकर्ताओं में राहत और खुशी की भावना देखी जा रही है। उनका मानना है कि उनकी नाराजगी को आखिरकार गंभीरता से लिया गया। दूसरी ओर निष्कासित कार्यकर्ताओं को लेकर भी संगठन के भीतर असहमति है। कई कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि या तो निष्कासन रद्द किया जाए, या फिर जिन्होंने सामूहिक इस्तीफा दिया था, उनके मामलों में भी समान निर्णय लिया जाए। यानी विवाद खत्म नहीं हुआ है, सिर्फ उसका स्वरूप बदल गया है।
यह पूरा घटनाक्रम डोंगरगढ़ भाजपा की उस यात्रा को भी सामने लाता है, जिसमें कभी संगठन की ताकत ने कांग्रेस के गढ़ को ढहा दिया था, लेकिन आज वही संगठन अपने ही कार्यकर्ताओं के भरोसे, भागीदारी और सम्मान के सवालों से जूझ रहा है। 2018 और 2023 के विधानसभा चुनावों में मिली हार ने भी यह संदेश दिया कि संगठनात्मक मजबूती अब पहले जैसी नहीं रही। यही कारण है कि डोंगरगढ़ में पार्टी का हर फैसला अब सिर्फ मंडल स्तर का नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति तय करने वाला कदम माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई व्यवस्था के साथ डोंगरगढ़ भाजपा अपने पुराने भरोसे को वापस पा सकेगी, या फिर यह विवाद आने वाले समय में संगठन के लिए और बड़ी चुनौती बनकर लौटेगा। फिलहाल इतना तय है कि डोंगरगढ़ भाजपा में जो हुआ, वह सिर्फ एक मंडल का भंग होना नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही अंदरूनी राजनीति का खुला विस्फोट है।
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