टुकेश्वर लोधी, आरंग। भारत सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से संचालित ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत आरंग में पांडुलिपि सर्वेक्षण किया जा रहा है, जिसके तहत 100 साल पुरानी दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां मिली है।

कलेक्टर के मार्गदर्शन में चलाया जा रहा अभियान

बता दें कि जिला कलेक्टर डॉ. गौरव कुमार सिंह के मार्गदर्शन में अभियान चलाया जा रहा है। इसी कड़ी में सर्वेक्षण टीम को अग्रवाल पारा निवासी व्यवसायी दीपक साहेब और उनकी धर्मपत्नी शिक्षिका शीला गुरु गोस्वामी के निवास से पांडुलिपियां मिली है।

गुरु गोस्वामी परिवार ने क्या कहा ?

परिवार के अनुसार, ये पांडुलिपियां उनके परदादा स्व. भैया साहेब और स्व. भाऊ साहेब द्वारा स्वयं अपने हाथों से लिखी गई थीं। इस पर गुरु गोस्वामी परिवार ने कहा कि हमारे पूर्वज सात्विक ज्ञान यज्ञ, सत्संग, चौका और आरती जैसे आध्यात्मिक अनुष्ठानों में गहरे रचे-बसे थे। यह संग्रह उनकी उसी साधना का लिखित प्रमाण है। इन पांडुलिपियों का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इनका सीधा संबंध छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध तीर्थ दामाखेड़ा और कबीर पंथ से है।

विशेषज्ञों ने क्या कहा ?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह दस्तावेज कबीर पंथी विचारधारा के प्रसार और तत्कालीन धार्मिक क्रियाकलापों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। यह छत्तीसगढ़ के स्थानीय इतिहास और आध्यात्मिक विकास को समझने के लिए शोधकर्ताओं के लिए एक खजाना साबित हो सकते हैं।

प्रशासन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

विकासखंड शिक्षा अधिकारी दिनेश शर्मा के नेतृत्व में आरंग क्षेत्र में ऐसी दुर्लभ धरोहरों को खोजने और सहेजने का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य इन जीर्ण-शीर्ण होती पांडुलिपियों को केवल भौतिक रूप से सहेजना नहीं, बल्कि इनका डिजिटलीकरण (Digitalization) करना है। इससे न केवल ये दस्तावेज नष्ट होने से बचेंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियां और शोधार्थी इंटरनेट के माध्यम से अपनी जड़ों और समृद्ध भारतीय संस्कृति से रूबरू हो सकेंगे।

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