समय रहते बरती गई सावधानियां हमें बाद के पछतावे से बचाती हैं. श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्” के अनुसार मनुष्य को स्वयं अपने उत्थान का प्रयास स्वयं करना चाहिए. क्योंकि आत्म-संयम और विवेक ही जीवन को असली सुरक्षा देता है. जीवन की कुछ गलतियां ऐसी होती हैं, जिन्हें सुधारने का अवसर मिल जाता है, लेकिन कुछ ऐसी होती हैं, जिसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ जाती है. समझदारी का तक़ाज़ा तो यही है कि सावधानी ही इतनी हो कि ग़लती को अवसर ही ना मिले.

“पछतावे से बेहतर है सावधानी.” “Better safe than sorry.” यह जीवन का सरल लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सूत्र है. स्मरण रहे अपने भीतर पछतावे का भाव समेटे शब्द ‘काश’ का इस्तेमाल जीवन में कम कम से कम होना चाहिए. “काश! मैंने पहले सोचा होता”, “काश! मैंने उस समय सावधानी बरती होती.” यह सभी ‘काश’ बिलकुल उस तरह से है जैसे दुर्घटना हो जाने के बाद हेलमेट की याद आना, बीमारी बढ़ जाने के बाद स्वास्थ्य की चिंता करना, आर्थिक नुकसान के बाद बचत के महत्व को समझना या रिश्ते में दरार आने के बाद शब्दों की मर्यादा का ख़्याल आना.

सावधानी डर का नहीं बल्कि दूरदर्शिता, विवेक और जिम्मेदारी का परिचायक है. याद रहे सड़क पार करते समय दोनों ओर देखने वाला भयभीत नहीं जागरूक कहलाता है. किसी निवेश से पहले अच्छी तरह जानकारी लेने वाला डरा हुआ नहीं बल्कि अपने भविष्य के प्रति जिम्मेदार होता है और बोलने से पहले अपने शब्दों को तौलने वाला कमजोर नहीं बल्कि संबंधों के प्रति संवेदनशील होता है.

आज के डिजिटल युग में सावधानी का महत्व और भी बढ़ जाता है. एक गलत लिंक पर क्लिक करना मुसीबत बन सकती है, बिना जांच के किसी खबर को साझा करना, एक बड़ी समस्या हो सकती है. अपनी निजी जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को देना या जल्दबाजी में ऑनलाइन लेन-देन जोखिम भरा हो सकता है. हर युग मेंकुछ सेकंड की सावधानी कई घंटों, दिनों या वर्षों के पछतावे से हमें बचा सकती है.

किसान मौसम का मिजाज देखकर अपनी फसल की तैयारी करता है. नाविक तूफान का रुख़ देखकर यात्रा की दिशा तय करता है. पर्वतारोही हर कदम फूंक- फूंक कर रखता है. क्योंकि जीवन में सफलता के लिए जितनी साहस की जरूरत होती है, उतना ही विवेक भी चाहिए होता है.

सावधानी का अर्थ आशंकित रहना कतई नहीं है, क्योंकि अत्यधिक भय जीवन को बाधित करती है और संतुलित सावधानियां जीवन को सुरक्षित और बेहतर बनाती है. सुरक्षित मात्रा में उठाया गया जोखिम भी बड़ी सफलता के लिए आवश्यक होता है, कोमल रिश्तों में क्रोध में बोले गए कुछ शब्द वर्षों पुराने संबंध को चूर-चूर कर सकते हैं. रिश्तों में प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा ठहर जाना, सुन लेना और फिर बोलना गहरे रिश्तों को टूटने से बचा सकता है. एक क्षण का संयम, जीवनभर के पछतावे से कहीं बेहतर होता है.सावधानियां भविष्य के प्रति प्रदर्शित हमारा सम्मान है. हर निर्णय के कुछ परिणाम होते हैं, इसलिए हर बार निर्णय से पहले थोड़ा सोचना जरूरी है. पछतावा, पीछे मुड़कर देखने से पैदा होता है और सावधानी आगे देखकर चलने की कला है.

हर अहम फ़ैसले से पहले खुद से सवाल करें कि “क्या मैं इस कदम के परिणाम के लिए तैयार हूं?” यदि उत्तर स्पष्ट नहीं है तो थोड़ा ठहर जाइए क्योंकि रुकना कमजोरी नहीं, समझदारी है. बड़े नुकसान की कीमत में अनुभव खरीदने से बेहतर है मुफ़्त में मिली सावधानी से सबक लें.

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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