गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलों को अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे धर्म और समाज पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे सैकड़ों याचिकाएं अलग-अलग रीति-रिवाजों पर आने लगेंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे। इससे धर्म और सभ्यता दोनों को नुकसान हो सकता है।
यह टिप्पणी नौ जजों की संविधान पीठ ने की, जो अलग-अलग धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे और महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय का केस भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी 40 साल पुरानी जनहित याचिका (PIL) की वैधता पर सवाल उठाए थे। दाऊदी बोहरा समुदाय की केंद्रीय संस्था ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें 1962 के उस फैसले को निरस्त करने की मांग की गई थी, जिसमें बंबई बहिष्कार निवारण अधिनियम, 1949 को रद कर दिया गया था।
इस कानून के तहत किसी भी समुदाय के सदस्य को समाज से बाहर करने को अवैध माना गया था। वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई प्रथा किसी व्यक्ति के सामाजिक या गैर-धार्मिक आचरण के जवाब में अपनाई जाती है, तो उसे संविधान के तहत धार्मिक संरक्षण नहीं मिल सकता। यदि कोई प्रथा धार्मिक पहलू भी रखती है, लेकिन वह मौलिक अधिकारों पर गंभीर प्रभाव डालती है, तो उसे संवैधानिक संरक्षण से बाहर रखा जा सकता है।
इस दलील पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि यदि हर कोई संवैधानिक अदालत के समक्ष कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों या धर्म से जुड़े मामलों पर सवाल उठाना शुरू कर दे, तो फिर उस सभ्यता का क्या होगा, जहां धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है? सैकड़ों याचिकाएं होंगी जो इस अधिकार, उस अधिकार, मंदिर के खुलने और बंद होने पर सवाल उठाएंगी। हम इस बात से अवगत हैं।
सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई हुई
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है। इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
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