शिखिल ब्यौहार,भोपाल। मध्यप्रदेश के बहुचर्चित आरटीओ (RTO) आरक्षक सौरभ शर्मा मामले में एक नया मोड़ आ गया है। ‘काले धन का कुबेर’ कहे जाने वाले आरक्षक सौरभ शर्मा ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के खिलाफ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सौरभ शर्मा ने याचिका दायर कर ED द्वारा की गई कार्रवाई की वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
बिना पक्ष सुने संज्ञान लेना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका में सौरभ शर्मा की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं का हवाला देते हुए राहत मांगी गई है। याचिका के मुताबिक, BNSS की धारा 233(1) के तहत किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में जांच एजेंसी द्वारा इस कानूनी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। आरोपी का पक्ष सुने बिना ही सीधे संज्ञान ले लिया गया, जो कि निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकारों का सीधे तौर पर खुला उल्लंघन है।
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सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का दिया हवाला
आरक्षक सौरभ शर्मा ने अपनी याचिका को मजबूत करने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट – PMLA) मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले का भी हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों के मुताबिक आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए था, जिससे वह इस मामले में वंचित रहा है।
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यह है पूरा मामला
बता दें कि आरटीओ आरक्षक सौरभ शर्मा के ठिकानों पर हुई छापेमारी के दौरान आय से अधिक करोड़ों रुपये की बेहिसाब संपत्ति और काले धन का खुलासा हुआ था। मामला बड़ा होने के कारण इसमें ED की एंट्री हुई थी और मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच व कार्रवाई शुरू की गई थी। अब हाईकोर्ट में दायर इस याचिका के बाद इस हाई-प्रोफाइल मामले में कानूनी दांवपेच और दिलचस्प हो गए हैं।


