कैथल: कैथल के गांव चक्कू लदाना में शुक्रवार को आयोजित ग्राम स्तरीय फसल अवशेष प्रबंधन कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को पराली न जलाने की सलाह दी। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हिसार) के अधीन कार्यरत कृषि विज्ञान केंद्र, कैथल के नोडल अधिकारी व वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार ने किसानों को बताया कि पराली को जलाने के बजाय आधुनिक तकनीकों से खेत में ही (इन-सिटू) प्रबंधन करने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति में सुधार होता है और पर्यावरण का बचाव होता है।

मिट्टी में बढ़ता है जैविक कार्बन, सरकार दे रही सब्सिडी

डॉ. अमित कुमार ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि फसल अवशेष किसानों के लिए बेहद उपयोगी हैं। पराली का यथास्थान प्रबंधन करने से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जो जमीन की उर्वरता बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाता है। उन्होंने किसानों को जानकारी दी कि फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सरकार द्वारा अनुदान (सब्सिडी) पर आधुनिक मशीनें उपलब्ध करवाई जा रही हैं।

पराली जलाने से नष्ट होते हैं मित्र कीट

कार्यक्रम में मौजूद कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जसबीर सिंह ने धान के फानों में आग लगाने के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पराली जलाने से उठने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ाता है और मानव स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसके साथ ही खेत में आग लगाने से मिट्टी में मौजूद मित्र कीट और लाभदायक सूक्ष्मजीव भी नष्ट हो जाते हैं।

प्राकृतिक खेती और शुद्ध खान-पान पर जोर

डॉ. जसबीर सिंह ने किसानों को प्राकृतिक खेती के फायदे समझाए। उन्होंने कीटनाशक-मुक्त सब्जियों के उत्पादन, प्राकृतिक उत्पादों की मार्केटिंग, दूध उत्पादन और स्वच्छ व शुद्ध खान-पान के विषय में विस्तार से मार्गदर्शन किया। इस जागरूकता कार्यक्रम में प्रगतिशील किसान जोधा राम सहित गांव के 75 से अधिक किसानों ने भाग लिया।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m