कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। दिग्विजय चौटाला की छात्र संगठनों को एक मंच पर लाने की पहल ने हरियाणा की सियासत में हलचल बढ़ा दी है। सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि छात्रों के लिए साझा समिति बनेगी या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि इस समिति के बहाने प्रदेश में नई सियासी ताकत खड़ी करने की जमीन तो तैयार नहीं की जा रही?
हरियाणा की राजनीति में छात्र संगठन हमेशा से बड़े नेताओं के लिए राजनीतिक कैडर और भविष्य के नेतृत्व की पहली सीढ़ी रहे हैं। ऐसे में अलग-अलग विचारधाराओं वाले छात्र संगठनों को एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश के राजनीतिक मायने तलाशे जाना स्वाभाविक है।
साझा मंच के नाम पर सियासी समीकरण बदलने की कोशिश?
अगर दिग्विजय चौटाला विभिन्न छात्र संगठनों को अपने-अपने राजनीतिक झंडे किनारे रखकर एक साझा एजेंडे पर खड़ा करने में सफल होते हैं, तो इसका सीधा असर विश्वविद्यालय परिसरों से बाहर दिखाई दे सकता है।
एकजुट छात्र ताकत सिर्फ कैंपस की राजनीति नहीं बदलती, वह आने वाले वर्षों की चुनावी राजनीति के लिए जमीन भी तैयार करती है। यही वजह है कि प्रस्तावित समिति को लेकर सबसे बड़ा सवाल छात्र हित बनाम राजनीतिक हित का है।
असली खेल नेतृत्व का है!
छात्र संगठन साझा एजेंडे पर कितनी देर तक साथ रहेंगे? नेतृत्व किसके हाथ में होगा? फैसले छात्र हितों पर होंगे या राजनीतिक रणनीति उनका रास्ता तय करेगी? यही वे सवाल हैं जो इस पूरी कवायद की दिशा तय करेंगे।
अगर समिति राजनीतिक दलों के प्रभाव से ऊपर उठकर फीस, छात्रवृत्ति, रोजगार, कैंपस सुविधाओं और विद्यार्थियों के अधिकारों जैसे मुद्दों पर लड़ती है, तो यह हरियाणा में छात्र राजनीति का नया अध्याय लिख सकती है।
लेकिन अगर अलग-अलग संगठनों को एकजुट करने के पीछे राजनीतिक विस्तार की रणनीति हावी हुई, तो यह पहल छात्र मंच से ज्यादा एक नई सियासी धुरी साबित हो सकती है।
यानी दांव सिर्फ छात्र राजनीति का नहीं है—दांव हरियाणा की अगली सियासी पीढ़ी पर है। अब देखना यही है कि दिग्विजय छात्रों को आवाज देने के लिए मंच बना रहे हैं या अपनी सियासत के लिए नई जमीन तैयार कर रहे हैं?
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